दीपक मंद हो चला है टिमटिमाना धीमा हो गया है आयु का जल भी सूख चला है लौ की उपर उठने की शक्ति क्षीण है आंखो की ज्योति , शरीर की शक्ति , मस्तिष्क की विस्मृति , शमशान सा मौन, विकृति की नीरस शांति प्रयाण के लिये सब साजो - सामान जुटा चुकी है !
खांसी, दम घुटन, अव्यवो का दर्द, स्वासों का तोड, चंचल मन की अवरुद्ध गति... ये सब सामान छूट चुका है !
अब आगे की सुदूर मंजिल का भान करना है !
जाने की तैयारी है, रुकना भी कौन चाहता है.... किंतु आगे की सवारी का प्रबंध नही है, यह अनंत, असीम यात्रा बिन पाथेय कैसे संभव हो ?
मै स्वयं बड़ी जल्दी में हू.. इस घर का सामान फरोख्त हो चुका है !
अब दो सीढियां अवशेष है.. परंतु दृष्टी - अगोचर हैं !
किस ओर प्रस्थान करूँ ? असीम अंधेरा हैं .. यही विडंबना हैं !