Tuesday, 22 December 2009

स्वांग भरी मुस्कान

















दोस्तों
, यह रचना मैंने हिंद-युग्म में युनिकवी की अक्तूबर माह की प्रतियोगिता में भेजी थी जिसे ११ वा स्थान प्राप्त हुआ था और आज इसे आप सब के बीच पेश कर रही हू...उम्मीद है पसंद करेंगे

सब कुछ बिखरता जा रहा है
लेखनी की सांसे टूटने लगी है..
सारे गम अंतस को बींध कर..
अब तो नासूर बन चुके है..
जिनकी अथाह वेदना
जीने की उमीदो को
नोच-नोच कर
जिंदगी को तल्ख़ किये जाती है..!!

चेहरे की झुर्रिया
और गहरा चली है..
जो अट्टहास करती है..
उस मुस्कान पर
जो स्वांग भरती है..
झिलमिलाती झूठी खुशियों का..!!

मैं मन के इस अभेद्य
तिमिर को भेदने का
मानो आशाओं की मोम्बत्तिया जला,
असफल प्रयास करती हू..,
और....
मोमबत्तियों के गालो पर
पिघलते हुऐ मोम के आंसू
मेरी इस स्वांग भरती..
मुस्कान का..
मुल्ये चूका रहे है..!!

मैं थक चुकी हू..
इस दोहरी जिंदगी से..
मोम-बतीया अपने हाथो से बुझा..
उनके आंसू पोंछ देती हू..!!

10 comments:

Kishore Choudhary said...

कविता का स्तर तय करने के मानक क्या होते हैं इसकी जानकारी मुझे नहीं है. ग्यारहवां या कोई नहीं... इससे इतर आपकी कविता मुझे बेहतर और सम्पूर्ण लगी.

sangeeta said...

मैं थक चुकी हू..
इस दोहरी जिंदगी से..
मोम-बतीया अपने हाथो से बुझा..
उनके आंसू पोंछ देती हू..!!

बहुत दर्द भरी अभिव्यक्ति...... जज्बातों को खूब्सुअरत शब्द दिए हैं.....बधाई

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

'मोमबत्तियों के गालों पर
पिघलते हुए मोम के आंसू
मेरी इस स्वांग भरती..
मुस्कान का..
मूल्य चुका रहे है'

अनामिका जी,
दर्द सहकर दुनिया को प्रकाशमान करती 'शमा' का
बेहतरीन शब्द चित्रण देखने को मिला आपकी रचना में

शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

दिगम्बर नासवा said...

मैं थक चुकी हू..
इस दोहरी जिंदगी से..
मोम-बतीया अपने हाथो से बुझा..
उनके आंसू पोंछ देती हू....

दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो इंसान टूट जाता है ......... सब कुछ खो जाता है .........
दर्द भारी दास्तान है ये रचना ........

'अदा' said...

मैं थक चुकी हू..
इस दोहरी जिंदगी से..
मोम-बतीया अपने हाथो से बुझा..
उनके आंसू पोंछ देती हू....
Anamika ji,
aapki kavita ek sampoorn kavita hai jaisa Kishore ji ne kahan hai...aur agar wo kuch kah rahe hain to..ham aur kuchh bhi kahne ke kabil hain bhi nahi..
sach bahut hridaysparshi lagi aapki rachna..
aapka bahut bahut aabhar...

pradeepzpoems said...

Anamika...
bahut khoob....kaffi dino baad achhi hindi ke darshan kiye maine...kabhi kabhi chintit hota hun ki itna dard abhi bhi hai na humare samaaj mai...her rang ke do arth hain...!!

ek jivan ko kareeb se dikhane waali rachna...!

Likhte rahain...!

best...

- PRADEEP PATHAK

Jogi said...

came for the first time on your blog and read from starting...you write awesome..Please keep writing..
All the best !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Saade lagzon men prabhavi abhivyakti.

--------
अंग्रेज़ी का तिलिस्म तोड़ने की माया।
पुरुषों के श्रेष्ठता के 'जींस' से कैसे निपटे नारी?

dweepanter said...

बहुत ही सुंदर रचना है।

pls visit...
www.dweepanter.blogspot.com

ramadwivedi said...

मैं थक चुकी हू..
इस दोहरी जिंदगी से..
मोम-बतीया अपने हाथो से बुझा..
उनके आंसू पोंछ देती हू....
बहुत बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....साधुवाद..

Dr.Rama Dwivedi