Thursday, 4 February 2010

मत करो मां मुझे इतना प्यार...


















मत लगाओ अपने सीने के पास
मत करो मां मुझे दिल से प्यार
नसीब ने ठोकरे दी हो जिसे
क्यू सुखाने चले तुम
उसके आंसू तमाम
छोड दो अकेला
जहां में उसे
छोड दिया जिसके रब ही ने जिसे
रेहने दो उसे उसकी
कडवाहटो के साथ
मत बढाओ मा दर्द मेरा
देकर अपने आंचल की छांव
सूख चला जो वृक्ष हू मै
वेदनाओ से आतप वक्ष हू मै ..
सीलन भरी है ये जिंदगी मेरी
नासूरो से है दिल की धरती अटी
कोशिश बहुत थी, कि
दो पळ को सुख की धूप पकड पाऊ
अपने गीले जज्बात सुखा पाऊ
कही कोई हवा मिल जायें
दिल के कोठर की बंद..
सीली गलियो को अपनी
लहर दे जायें.
मगर मां ऐसा होता नही
जिसे अपनाना चाहा
वो मेरा होता नही
पळ दो पळ की खुशियो के पीछे
म्रिग -मारीचीका सी जिंदगी
भागी जाती हैं क्यू
अनजान, असीमित मंजिल हैं..
फिर भी ये जिंदगी जीती जाती हैं क्यू
मां तुम भी दुत्कारो ना मुझे
जो आ गयी हू तुम्हारे दिल के पास
मत लगाओ इतना करीब
अपने सीने से
मत करो मां मुझे इतना
दिल से प्यार.

17 comments:

M VERMA said...

पळ दो पळ की खुशियो के पीछे
म्रिग -मारीचीका सी जिंदगी
भागी जाती हैं क्यू

एहसास की बहुत सुन्दर रचना

'अदा' said...

क्या है री अनामिका की बच्ची..
ये कैसी कविता है...!!! ????
अनाप-शनाप....मुझे अच्छी नहीं लगी...कल्लो जो कलना है....:):)

अनिल कान्त : said...

is kavita mein mujhe tamaam ehsaas mile

विनोद कुमार पांडेय said...

एक बार फिर बेहतरीन....बधाई

Mithilesh dubey said...

क्या बात है बहुत खूब , आपकी कविता दिल को छू गयी ।

महफूज़ अली said...

एहसास की बहुत सुन्दर रचना....

sangeeta swarup said...

व्यथा तो गहरी है....लेकिन माँ के प्रति ये भाव ? अपनी अपनी परिस्थिति होती है....पर मैं सामंजस्य नहीं बैठा पा रही...

वैसे बहुत भावुक रचना है...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अनामिका जी, आदाब
मत लगाओ इतना करीब
अपने सीने से
मत करो मां मुझे इतना
दिल से प्यार.
लेकिन......मां तो आखिर मां होती है..

Kishore Choudhary said...

कष्टों को ईश्वर की देन मान चुकी एक मर्माहत तरुणी अपार दुखों से घिरी हुई, अपनी माँ से हृदयविदारक याचना कर रही है कि उसकी दौड़ ही उसके लिए अभिशाप बन गयी है. वह संबन्ध से उपजे राग को आभासी जल का प्रतीक रूप कहती हुई मन को व्यक्त करना चाहती है. असीमित मंजिल... ? लेकिन फिर भी कविता कहीं आश्वस्त करने का प्रयास करती है कि प्यार किसी ना किसी रूप में बचा रहेगा. आपने एक प्रेम राग से उपजे दुःख को शब्द देने चाहे हैं या फिर किसी अमिट अभिलाषा में बंधे मन की गति को दर्शाया है इसे स्पष्ट करना चाहिए. छायावादी कविता का समय अभी लौट कर नहीं आया है. आज की ज़िन्दगी में जो दृश्य मुझे दीखते हैं उनके साथ अंतर्मन को सम्बद्ध कर पाने के लिए मैं सोचता हूँ कि बिम्ब भी कुछ यथार्थपरक हों. कविता के बहाने काल्पनिक दुःख यानि कविता जिन स्थितियों का उद्घाटन नहीं कर पाती है वे दुःख आधारहीन हो जाया करते हैं. शब्दों से रचे गए करुण दृश्य हवा में झूलते हुए ही हैं. उन्होंने अपने प्रिय से अथवा उन परिस्थितियों से साक्षात्कार नहीं करवाया है कि दुखों का हेतु क्या है ? अपनी सुविधा के अर्थ लगाये जा सकने की छूट मैं अपनी पसंद की कविताओ को नहीं देता हूँ. कविता एक अफ़सोस का पिंड मात्र बन जाये तो ये विफलता है और उस कविता का कोई भाग्य भी नहीं है. आपको अमित लेखन की शुभकामनाएं

अजय कुमार said...

कोमल एहसास और संवेदनशील रचना , बधाई

अनामिका की सदाये...... said...

Indu puri ji dwara bheji gayi tippani..

अब कोई क्या कहे तुम्हे ?
शिकायत कि प्यार नही तुमसे ,
जिद कि प्यार चाहिए ,पर अडीयालापन देखो कि मत दो.
नही चाहिए .
शिकायत ईश्वर से,दुनिया से ,सबसे ,खुद से ?
बाबा! माँ दूर नही तुमसे
वो तो हरेक दिल में होती है ,देखो तुम में भी है
देखती ही नही, जिद्दी बच्ची !
जीवन को गीत बना लो गीत रचना सार्थक हो जायेगा.
माँ खुद भी हो ना? माँ दूर है तो उसकी कोई मजबूरी होगी ,पर...
क्या वो अपने बच्चे से दूर होती है? मरने के बाद भी नही.
शिकायते करना छोड़ दो .

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा

दिगम्बर नासवा said...

आज इतनी उदासी क्यों ..........
जीवन का चक्र है इसे पूरा तो सब ने करना है तो फिर प्यार से क्यों नही ......
बहुत संवेदनशील रचना है .........

JHAROKHA said...

मगर मां ऐसा होता नही
जिसे अपनाना चाहा
वो मेरा होता नही
पळ दो पळ की खुशियो के पीछे
म्रिग -मारीचीका सी जिंदगी
भागी जाती हैं क्यू
अनजान, असीमित मंजिल हैं..
फिर भी ये जिंदगी जीती जाती हैं क्यू
मां तुम भी दुत्कारो ना मुझे
जो आ गयी हू तुम्हारे दिल के पास
मत लगाओ इतना करीब
अपने सीने से
मत करो मां मुझे इतना
दिल से प्यार| अच्छी रचना के लिये बधाई स्वीकारें

ज्योति सिंह said...

मगर मां ऐसा होता नही
जिसे अपनाना चाहा
वो मेरा होता नही
पळ दो पळ की खुशियो के पीछे
म्रिग -मारीचीका सी जिंदगी
भागी जाती हैं क्यू
अनजान, असीमित मंजिल हैं..
फिर भी ये जिंदगी जीती जाती हैं क्यू
bahut hi karun magar ek had tak satya bhi ,mamta hi sinchati hai prem aur vichhoh se vedna ,naari peeda ki jwala dhadhkati rahi kal bhi aaj bhi aur na jaane aage kab tak ,main stri hoon to behtar mahsoos kar sakti ise .kishore ji ki baate bahut umda lagi .aapki tippani ke liye aabhari hoon ,thoda vyast rahi bitiya ki janam din ki taiyari me aur mehmaan bhi 15 dino se kolkata se aaye huye hai magar aapki baate man ko bhiga gayi aur tumne pukara aur hum chale aaye
.wafao ke rishte nahi totte ,ye bandhan bandhe to nahi chhotte .ahsaas ko alfaz ki nahi hoti jaroort ,magar ye haq dil ko bha gaya .

अलीम आज़मी said...

aapki rachna maa par jo likhi hai ...kafi achchi hai ... har ek line dil ko chu gayi ...aasha karte hai aise aur rachnayein aapki hume apke blogs par dekhne ko milegi ...aapki har rachna apne aap me lajawwab hai... shukriyaaaa

निर्मला कपिला said...

मगर मां ऐसा होता नही
जिसे अपनाना चाहा
वो मेरा होता नही
पळ दो पळ की खुशियो के पीछे
म्रिग -मारीचीका सी जिंदगी
भागी जाती हैं क्यू
अनजान, असीमित मंजिल हैं..
फिर भी ये जिंदगी जीती जाती हैं क्यू
गहरे एहसास संवेदनाओं से भरपूर बेहतरीन कविता। शुभकामनायें