Wednesday, 2 November 2011

क्या मैं गलत हूँ ?




मतभेदों से उठती 

वेदनाओं से 
मैं अस्त-व्यस्त सी हूँ.
मेरे  उपालंभों को 
गलत आकार दे 
तुम सदा भटके राही की तरह 
कर्कशता और कुप्ता के 
भाव लिए 
विकारों को जन्म देते गए 
और फासले बढाते गए .
कभी इन उलाहनों  में 
छिपी आत्मीयता  की 
गमक को जानने की 
कोशिश नहीं की .
जब तक ये निजता की 
सुवास है, 
प्यार की प्यास है ....
ये शिकायतों का 
व्यापार  चलता रहेगा. 

क्या कभी गैरों से 
कोई शिकायत करता है ?
क्या ऐसा नहीं लगता कि 
मन  की उलझनों को,
गांठों को , 
खुशियों को ,
अवसाद को 
गर सांझा ना करुँगी तो 
कुछ परायापन आ जायेगा,
रिश्तों में कुछ बनावट,
कुछ ठहराव सा 
आ जायेगा .

 मैं सदा इस अलीक 
दीवार को  डहाने के  लिए , 
इस परायेपन की  
बांस को बुहारने के लिए,
प्रयासरत...
आज  तुमसे 
विद्रोह  करने का 
साहस कर , 
तुम्हारी  दिशा विहीन सी 
भटकन को रोकना 
चाहती हूँ...!

इसी अश्रांत चेष्टा में 
हर बार
मेरी भावनाओं  
के मेघ तुम्हारे  
कठोराघातों से 
छुई-मुई हो 
फूटते रहे हैं ....
और पलकों का 
अविरल प्रवाह 
बेबसी के अंगारों  सी 
जलन लिए सोचता है 
कि  क्या मैं गलत हूँ ?

46 comments:

kshama said...

और पलकों का
अविरल प्रवाह
बेबसी के अंगारों सी
जलन लिए सोचता है
कि क्या मैं गलत हूँ ?
Nahee! Bilkul bhee galat nahee!

वाणी गीत said...

उपलाम्भों को गलत आकार देना कई बार अखरता है और चुप रह जाने को मन करता है , मगर यदि चुप्पी हो गई तो रिश्तों की उष्णता ही समाप्त हो जाएगी ...तो फिर गलत कहाँ !

vandan gupta said...

गलत तो नही है मगर ये वो कब समझेगा ये ही प्रश्न उठता है ।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...
This comment has been removed by the author.
संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मैंने कहीं पढ़ा था ... बात इस तरह से की जाए कि -- कही बात का वही मतलब निकले जो कहा जा रहा है .. फिर गलत आकार की कोई संभावना नहीं रहेगी ..

भावनाओं को बखूबी लिखा है ..मन की कश्मकश को प्रश्न के माध्यम से उकेरा है .. अच्छी प्रस्तुति

Anonymous said...

मन की उलझनों को,
गांठों को ,
खुशियों को ,
अवसाद को
गर सांझा ना करुँगी तो
कुछ परायापन आ जायेगा,
रिश्तों में कुछ बनावट,
कुछ ठहराव सा
आ जायेगा .


बहुत सुन्दर भावो से भरी पोस्ट......शानदार |

फुरसत मिले तो हमारे ब्लॉग 'जज़्बात' की नयी पोस्ट ज़रूर देखें|

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति , आभार.

रचना दीक्षित said...

मन कि भावनाओं को सुन्दर शब्दों से सजाया है

Manish Kumar Khedawat said...

रिश्तों को बनावटी और पराया होने से बचाना कैसे गलत हो सकता हैं :)
बहुत सुंदर :)

अरुण चन्द्र रॉय said...

खूबसूरत कविता. मन के भाव स्फुटित हो रहे हैं...

संध्या शर्मा said...

और पलकों का
अविरल प्रवाह
बेबसी के अंगारों सी
जलन लिए सोचता है
कि क्या मैं गलत हूँ ?नहीं बिलकुल नहीं...!

मन की भावनाओं और कशमकश को सुन्दर शब्द दिए है आपने...

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन भाव।

सादर

सदा said...

वाह ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

Rajesh Kumari said...

man ke bhaavo ki uttam abhivyakti.

सूबेदार said...

बहुत सुन्दर पोस्ट ,कबिता का कितना वर्णन ---------- उच्ची कोटि की सम्बेदना.

Pallavi saxena said...

mujhe nahi lagta aap galat hain rishton ko banavti pan se bachaana kabhi galat nahi ho sakta ...

प्रवीण पाण्डेय said...

आप अपने भावों से शब्दों को भी गहरा कहने को विवश कर देती हैं।

मनोज कुमार said...

कवयित्री के ग़लत होने का प्रश्न ही नहीं उठता।
रचनाकार तो बहुत सारी बातों का विचार कर सृजन करता है। उस सृजन में भावनाओं की संवेदना समाई होती है। इसलिए पाठक उससे एकात्म का अनुभव करता है।

Sadhana Vaid said...

मन की उहापोह और उद्वेलन को बड़ी ही सशक्त अभिव्यक्ति दी है ! एक अत्यंत प्रभावशाली एवं मार्मिक रचना !

Nirantar said...

aap galat nahee hein
saty se paripoorn rachnaa

monali said...

Galat to nahi magar sabhi samjhein ye zaruri bhi nahi.. ya hamesha samajhein ye mumkin bhi nahi...

इस्मत ज़ैदी said...

इसी अश्रांत चेष्टा में
हर बार
मेरी भावनाओं
के मेघ तुम्हारे
कठोराघातों से
छुई-मुई हो
फूटते रहे हैं ....
और पलकों का
अविरल प्रवाह
बेबसी के अंगारों सी
जलन लिए सोचता है
कि क्या मैं गलत हूँ ?

waah ,kya baat hai !

प्रतिभा सक्सेना said...

'आज तुमसे
विद्रोह करने का
साहस कर ,
तुम्हारी दिशा विहीन सी
भटकन को रोकना
चाहती हूँ...'
- यह साहस ही अपनी पहचान बने और उद्देश्य पूरा हो !

Amit Chandra said...

बेहतरीन अभिव्यक्ति.

Anita said...

बहुत गहरे भाव लोक से आती हुई कविता... यहाँ हर कोई अपनी अपनी जगह सही है... गलत कुछ भी नहीं या फिर सब कुछ !

Maheshwari kaneri said...

गहन भाव सुन्दर अभिव्यक्ति...

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-687:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

तुम्हारी दिशा विहीन सी
भटकन को रोकना
चाहती हूँ...!

क्या मैं गलत हूँ ?
बहुत सुन्दर रचना...
सादर बधाई...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

इसी अश्रांत चेष्टा में
हर बार
मेरी भावनाओं
के मेघ तुम्हारे
कठोराघातों से
छुई-मुई हो
फूटते रहे हैं ....
और पलकों का
अविरल प्रवाह
बेबसी के अंगारों सी
जलन लिए सोचता है
कि क्या मैं गलत हूँ ?

GAHAN BHAVON KI SUNDAR ABHIVYAKTI...

चंदन said...

बहुत सुन्दर रचना... मन के झंझावतों को शब्दों में ढालना बहुत हि कठिन है... बहुत हि भावनात्मक!

पूनम श्रीवास्तव said...

anamika ji
bahut hi sahi ivishay ko chuna hai aapne .ye sach hai ki agar ham apne dil ki baat ko apno par hi nahi jahir karenge chahe vo gile shikve hi kyon na ho to fir man hi man me kunthit hote rahenge .atah dil ki baat ko kah dena hi uchit hai varna rishto me daraar padte der nahi lagti hai.
bahut hi sateek prastuti
poonam

Satish Saxena said...

सकारात्मक विचार और बढ़िया अभिव्यक्ति ....
शुभकामनायें आपको !

amrendra "amar" said...

इसी अश्रांत चेष्टा में हर बारमेरी भावनाओं के मेघ तुम्हारे कठोराघातों से छुई-मुई हो फूटते रहे हैं ....और पलकों का अविरल प्रवाह बेबसी के अंगारों सी जलन लिए सोचता है कि क्या मैं गलत हूँ ?
प्रभावशाली कविता.... बहुत सुंदर

प्रेम सरोवर said...

सुंदर मन की सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद ।

Anupama Tripathi said...

•आपकी किसी पोस्ट की हलचल है ...कल शनिवार (५-११-११)को नयी-पुरानी हलचल पर ......कृपया पधारें और अपने अमूल्य विचार ज़रूर दें .....!!!धन्यवाद.

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

बहुत खूबसूरत रचना...
डा.नवाज़ देवबंदी का एक शेर समाअत फ़रमाएं-
ऐसी वैसी बातों से तो बेहतर है खामोश रहें
या फिर ऐसी बात कहें, जो खामोशी से बेहतर हो.

रजनीश तिवारी said...

भावपूर्ण सुंदर रचना । शुभकामनाएँ ..

अनुपमा पाठक said...

गहरे भाव!

प्रेम सरोवर said...

एक अच्छी और गहन रचना. की प्रस्तुति के लिए धन्यवाद । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

Minakshi Pant said...

और पलकों का
अविरल प्रवाह
बेबसी के अंगारों सी
जलन लिए सोचता है
कि क्या मैं गलत हूँ ?..........तो फिर आपका दिल क्या कहता है ? यही न की नहीं मैं गलत हरगिज़ नहीं | :)
बहुत सुन्दर रचना |

रश्मि प्रभा... said...

मैं सदा इस अलीक
दीवार को डहाने के लिए ,
इस परायेपन की
बांस को बुहारने के लिए,
प्रयासरत...
आज तुमसे
विद्रोह करने का
साहस कर ,
तुम्हारी दिशा विहीन सी
भटकन को रोकना
चाहती हूँ...!
yah galat ho hi nahi sakta

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

bahut bhavpoorn,prabhavee rachna
hardik badhai
dr.bhoopendra
rewa
mp

कविता रावत said...

man ki kashmkash se uthti bhawanaon ke jwar ka prabhavpurn dhang se chitran kiya hai aapne, jo ki man ko chhu gaya..

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

क्या कभी गैरों से
कोई शिकायत करता है ?
क्या ऐसा नहीं लगता कि
मन की उलझनों को,
गांठों को ,
खुशियों को ,
अवसाद को
गर सांझा ना करुँगी तो
कुछ परायापन आ जायेगा,
रिश्तों में कुछ बनावट,
कुछ ठहराव सा
आ जायेगा

hridaysparshi,bhavpoorn prastuti.

कुमार राधारमण said...

प्रेम अपने भीतर ही है। उसी से अपनी शांति है और दूसरों को प्रेममय बनाने की संभावना भी।