Friday, 1 August 2014

चाँद पिघल रहा है

Image result for pics of moon & baby



चाँद की तासीर 
ठंडक लिए होती है 
तो क्यों आज 
पिघल रहे हो 
चाँद तुम … ?

जानती हूँ 
इस पिघलन में 
कितनी व्याकुलता है 
कितनी अपने ही टुकड़ो में 
टूटने की विवशता है     

कितनी वेदना को 
आत्मसात किया  होगा 
चाँद तुमने 
तब कहीं जा कर 
पिघलने पर 
मजबूर हुए होंगे. 

देखती हूँ 
तुमसे ही अवभासित  
तुम्हारी आँखों के तारे 
तुम्हारे ये तारे 
इतरा रहे हैं  
अपने रूप पर 

तुमसे अस्तित्व पाकर 
तुम में ही दाग दिखाते हैं  
तुम पर प्रहार कर  
तुमसे अपृक्त (विलग ) हो 
तुम्हे ही नगन्य बताते हैं  !!

आज के युग के ये तारे 
पूर्वाग्रहों में डूबे 
छद्य समाज से परिष्कृत 
कठुराघात करते 
टमकाते, मटकाते  
ओ चाँद, 
तुझे ही 
खंड खंड करते 
तेरी शीतलता को 
उच्छिन्न कर तुझे 

गर्माते ही जाते हैं !!



25 comments:

Anita said...

आज के हालात पर प्रभावशाली ढंग से उठी कलम..

कालीपद प्रसाद said...

तुमसे अस्तित्व पाकर
तुम में ही दाग दिखाते हैं
तुम पर प्रहार कर
तुमसे अपृक्त (विलग ) हो
तुम्हे ही नगन्य बताते हैं !!

आज की पीढ़ी का सच प्रगट करती है !
नई पोस्ट माँ है धरती !

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना शनिवार 02 अगस्त 2014 को लिंक की जाएगी.........
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

सदा said...

सार्थकता लिये ... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

संध्या शर्मा said...

कितनी वेदना को
आत्मसात किया होगा
चाँद तुमने
तब कहीं जा कर
पिघलने पर
मजबूर हुए होंगे.
गहन अनुभूति …

प्रतिभा सक्सेना said...

' तुमसे अस्तित्व पाकर
तुम में ही दाग दिखाते हैं
तुम पर प्रहार कर
तुमसे अपृक्त (विलग ) हो
तुम्हे ही नगन्य बताते हैं !!'
- यही होता आया है:कृतज्ञता, कृतघ्नता मे बदल जाती है और अपना महत्व दिखाने को वही लोग दूसरे को नगण्य समझ लेते हैं !
संवेदनाओं से पूर्ण कविता!

sadhana vaid said...

बहुत सुन्दर रचना ! चाँद तारों के माध्यम से कितनों की व्यथा कथा को उकेर दिया है ! बहुत बढ़िया ! आज की दुनिया का यही चलन हो गया है जैसे !

सु..मन(Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

कविता रावत said...

सच आस पास का वातावरण जब अच्छा न हो तो फिर अच्छे की आस बेमानी है .. "company does affect"
बहुत बढ़िया

Anusha Mishra said...

वाह...बहुत बढ़िया

मनोज कुमार said...

उफ़्फ़! कितना दर्द है! कहां से लाती हैं? चांद को इस पिघलन से बचाना होगा!

Kailash Sharma said...

बहुत प्रभावी विम्ब...आज के यथार्थ का बहुत मर्मस्पर्शी चित्रण...

Smita Singh said...

बहुत बढ़िया

Pratibha Verma said...

सुन्दर रचना...

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बेहतरीन ... निःशब्द करती रचना

निवेदिता श्रीवास्तव said...

बेहतरीन .....

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aadarneyaa ..bhavmayee samvednaaon ko jagaane waalee shaskt rachna ke liye the dil badhaaayee.saadar

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

aadarneyaa ..bhavmayee samvednaaon ko jagaane waalee shaskt rachna ke liye the dil badhaaayee.saadar

Anju (Anu) Chaudhary said...

बहुत खूब

संजय भास्‍कर said...

चाँद तुमने
तब कहीं जा कर
पिघलने पर
मजबूर हुए होंगे.
......गहन अनुभूत!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!

Prasanna Badan Chaturvedi said...

बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें...

प्रेम सरोवर said...

आपकी संवेदनशील रचना मन के भावों को दोलायमान कर गई। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है। शुभ रात्रि।

Sriprakash Dimri said...

गहन अभिव्यक्ति आज के समाज में अच्छाईयों में भी बुराईयां ढूँढने के प्रवृत्ति पर कटाक्ष करती शशक्त रचना
शुभ कामनाएँ

अरुण चन्द्र रॉय said...

संवेदित करने वाली कविता।