Saturday, 10 October 2009

तुम मुझ में हो..

मैं तुम में ही
खुद को ढूँढ लेती हू..
तुम्हारे लफ्जों में
अपना दर्द जी लेती हू..
बाकि कुछ रह जाता नहीं..
कहने को फिर...
की तुम मुझ में ही
हो तो सही...
ये सोच
बढ़ते फासलों को
समेट लेती हू...!

लम्हे प्यार के..
जब कभी सुकड़ जाते है..
तब..
दर्द के साए
थोड़े और बढ़ आते है..!

मगर जब भी
रुख बदलते है मौसम के..
और बसंत के मेघ
जब बरस जाते है..
दर्द की जमी बरफ
तब पिघल जाती है..!

जान जाती हू तब..
की तुम कुछ अलग तो नहीं..
दर्द तुम भी तो
जीते हो वही
और ऐसे में तुम
ढलते हो
रिसती बरफ से लफ्जों में..

तब तुम्हारे लफ्जों में..
अपना दर्द जी लेती हू..
और तुम में ही
खुद को ढूंढ लेती हू..!!

4 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

sangeeta said...

लम्हे प्यार के..
जब कभी सुकड़ जाते है..
तब..
दर्द के साए
थोड़े और बढ़ आते है..!

दिल के जज़्बात बहुत खूबसूरती से लिखे हैं....बधाई

vinay vaidya said...

mere blog par tippanee ke liye aabhaaree hoon .
dhanyawaad.
aapkee kavitaaen bahut goodh gahan hain, aur sachmuch mujhe unhen samajhne men kathinee hotee hai,
maanataa hoon, ki aapkee kavotaaon ko jab samajhne lagoongaa, to bahut doobkar padhne lagoongaa .
lekin haan, thodaa wakt deejiye .