Tuesday, 13 October 2009

ख्वाहिशे....

ख़वाहिशो के मोती
इकट्ठा कर
एक ख्वाबो का घर
बना तो दिया था..
मासूम दिल नहीं जानता था
इसकी तासीर रेत के
घरोंदे की तरह है..
जो कुंठाओ के थपेडो से
ढह जायेगा..!
मैं फिर भी
उस मकडी की तरह
अथक प्रयास करती हु
की शायद कभी
इस खवाहिशो के घर को
यथार्थ की धरती
पर टिका पाऊ..
पर ना जाने क्या है..
या तो मेरी चाहत में कमी है
या मेरे सब्र का इम्तिहान...
की हर बार
मायुसिया सर उठा
मुझे और निराशाओ के
गलियारों में खीचती चली जाती है..!!
क्या ये मुनासिब नहीं..,
या फिर मैं झूठी
आशाओ में जीती हु..??
की ये खावाहिशो का घर
यथार्थ का सामना
कर पायेगा..
क्या सच में कभी
ये अपना वजूद
कायम कर पायेगा???

9 comments:

Rishu said...

khoobsurat ahsaas.......
keep sharing!!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

anterdwand men fansa mann kayi prashn kar raha hai....sundarta se ehsaas jiye hain.....

badhai

संजय भास्‍कर said...

बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 18 - 08 - 2011 को यहाँ भी है

...नयी पुरानी हलचल में आज ... मैं अस्तित्त्व तम का मिटाने चला था

Vandana Ramasingh said...

मैं फिर भी
उस मकडी की तरह
अथक प्रयास करती हु ....
बहुत सुन्दर अहसास के साथ घर बनाने की कोशिश

Anupama Tripathi said...

सपने और यथार्थ का अमन-सामना होने पर यही प्रश्न उठता है ...!!
बहुत सुंदर रचना अनामिका जी ...!!

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बेहतरीन।

सादर

mridula pradhan said...

bhawnaon ka komal sparsh.......

Dorothy said...

बेहद भावमयी और खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
सादर,
डोरोथी.