Tuesday, 14 September 2010

मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं...























अशांत सागर है ये पत्थर ना फैंको ए हमनशीं 
दर्द की लहरें  हैं, ना  खेलो, दर्द ना मिल जाए कहीं 

कसक बन के दिल में तुम हलचल सी करते हो 
पास आकार भी ना अपने से बन के मिलते हो .

ठंडी आहों का भी असर तुम पर अब होता नहीं
मनुहार कर के भी तो ये दिल पिघलता नहीं .

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी 
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं.

लो बुझा लेती हूँ अरमानों की इस कसकती  लौ को 
दफ़ना देती हूँ तुझमें  ही इन दगाबाज़ चाहतों  को.

प्यास बुझाने को मयखाने भी कहाँ बचे साकी 
छू भी लें तो वो एहसास कहाँ बचे बाकी.

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती 
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती 

टूटे खिलोने भी कहीं  जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.

67 comments:

मनोज कुमार said...

अनुभूति की सघनता एवं संश्लिष्ट संवेदना अपना प्रभाव छोड़ती हैं।

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बहुत ही भावपूर्ण पंक्तियाँ .....

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरी पंक्तियाँ सीधी हृदय में उतर गयीं।

Sadhana Vaid said...

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.
बहुत सशक्त अभिव्यक्ति ! बहुत प्यारी रचना ! दिल को कहीं गहराई तक छू गयी ! आभार !

रचना दीक्षित said...

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं
vaah अनामिका कितना दर्द भर दिया आज तो छू गयी दिल को

दीर्घतमा said...

अशांत सागर है ----------
बहुत सुन्दर कबिता है दिल की गहरायियो को छू जाती है
अभी तक की हमारे दृष्टि से श्रेष्ठ
बहुत-बहुत धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.
वाह कया बात है .... बहुत सुंदर

खबरों की दुनियाँ , भाग्योत्कर्ष said...

बहुत खूब लिखा है - अशांत सागर है ये पत्थर ना फैंको ए हमनशीं
दर्द की लहरें हैं, ना खेलो, दर्द ना मिल जाए कहीं

कसक बन के दिल में तुम हलचल सी करते हो
पास आकार भी ना अपने से बन के मिलते हो . बहुत गहरी उतरती हैं ये लकीरें , अच्छी अभिव्यक्ति ,बधाई ।

'अदा' said...

kya baat hai..
bahut sundar hai anamika ji...

vandana said...

ek chatpatati si najm padhkar dil paseez gya....

Mrs. Asha Joglekar said...

मेरी मै तुम्हारी मै से मिलती नही । वाह क्या खूब लिखती हैं .

Akhtar Khan Akela said...

bhut khub likhaa he. akhtar khan akela kota rajsthan

रश्मि प्रभा... said...

shaant jal ko jhankrit na karo, ... waah

Udan Tashtari said...

क्या बात है!! वाह!




हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

वाणी गीत said...

अब मेरी "मैं " तुम्हारी "मैं "से मिलते नहीं ...
नजर बदलते ही नज़ारे बदल जाते हैं ...
खूबसूरत ग़ज़ल !

ana said...

आपकी हर कविता पढ़ते ही बनती है ............बहुत सुन्दर लिखा है आपने

वन्दना said...

गहरी और भावमयी प्रस्तुति।

ajit gupta said...

भाव तो अच्‍छे हैं लेकिन विधा क्‍या है? मुक्‍तक की श्रेणी में रखा जा सकता है। इसलिए विधा-विशेष में लिखने पर प्रभाव अधिक होता।

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मन में उड़ने वाली अशांत लहरों को लफ़्ज़ों में ढाला है ..जिसके लिए भी लिखा है बहुत निष्ठुर ही होगा वो शख्स और शायद बद्ददिमाग भी ...खैर
बहुत भावपूर्ण रचना हर शब्द से जैसे आंसू नहीं लहू टपकता हो ..

बहुत शिद्दत से निभायी तुमने प्रीत है
जिसके लिए लिखा , वो शायद बदनसीब है ..

संतोष कुमार said...

अनामिका जी बहुत ही अच्छी रचना ! हर्फ़ हर्फ़ मन की पटल पर अंकित हो रहे हैं ! हार्दिक बधाई आपको इस सुंदर रचना के लिए !

साकेत शर्मा said...

बहुत सुन्दर रचना..

arvind said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं.
..vah sundar rachna.

ZEAL said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती

What an expression !

Awesome !
.

शिवम् मिश्रा said...


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

shikha varshney said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं

बेमिसाल पंक्तियाँ अनामिका जी !

kshama said...

Ye sadayen dilo dimaag tak pahunch hi jati hain! Sach kitna dard hota hai jab,apni 'mai' aur unki 'mai' itne alag thalag ho jate hain!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

अचिंत्य भाव!अद्भुतशब्दावलि अऊर शानदार अभिव्यक्ति!!

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति| तीक्ष्ण अनुभूति|
ब्रह्माण्ड

दिगम्बर नासवा said...

कसक बन के दिल में तुम हलचल सी करते हो
पास आकार भी ना अपने से बन के मिलते हो ..

बहुत खूब ... संवेदनाओं से ओतप्रोत रचना .... कमाल का लिखा है ...

anupama's sukrity ! said...

कसक बन के दिल में तुम हलचल सी करते हो
पास आकार भी ना अपने से बन के मिलते हो ..

वह क्या बात कही है -
मन को छू गयी -
अनेक शुभकामनाएं .

JHAROKHA said...

हर पंक्ति लाजवाब---और गहन अनुभूतियों को प्रतिबिम्बित करने वाली।

चौपटिया ROCKS said...

bahut sunder

वीना said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती

बहुत सुंदर लिखा है...सीधी चोट करने वाली पंक्तियां....

Apanatva said...

bahut bhavpoorn abhivykti gahra asar chod gayee .
Anamika regular nahee rah pane ke liye kshamaprarthee hoo .

डॉ. हरदीप संधु said...

अनामिका जी !

भावपूर्ण पंक्तियाँ .....
मन को छू गयी !!!

mai... ratnakar said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती
अनामिका जी
ज़बरदस्त लेखन की श्रंखला में कुछ और मोती जोड़ने के लिए शुक्रिया और बधाई
गज़ब फलसफा और शिद्दत सहित हालात की बेहतरीन पेशकश की है

डा. अरुणा कपूर. said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं.


...बहुत ही सुंदर शब्दों की माला!

Babli said...

वाह! बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने ! हर एक शब्द में गहराई है और इस लाजवाब रचना के लिए बहुत बहुत बधाई!

दीपक 'मशाल' said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती
क्या खूब कहा अनामिका जी..

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

ठंडी आहों का भी असर तुम पर अब होता नहीं
मनुहार कर के भी तो ये दिल पिघलता नहीं .
और...
लो बुझा लेती हूँ अरमानों की इस कसकती लौ को
दफ़ना देती हूँ तुझमें ही इन दगाबाज़ चाहतों को.
बहुत अच्छे शेर हैं...
भावनाओं की अभिव्यक्ति में आप बुलंदी हासिल कर चुकी हैं.

शेफाली पाण्डे said...

vaah ...sabhi sher bahut umda hai...

अरुणेश मिश्र said...

कंकड़ी फेको नहीँ
फूल भी बोरो नही
और कागज की तरी
छोड़ो नही
खेल मे तुमको पुलक
उन्मेष होता है
लहर बनने मे सलिल को
क्लेश होता है ।
दिनकर

Pawan Rana said...

very nice

Coral said...

बहुत सुन्दर रचना

महफूज़ अली said...

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.


क्या लिखा है आपने.... बहुत ही असुंदर.....दिल को छू गया...

संजय भास्कर said...

kya baat hai..
bahut sundar hai anamika di...

सुशीला पुरी said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं.
लाजवाब शेर !!!

anu said...

हर शेर बहुत सुंदर है ..........

nilesh mathur said...

वाह! क्या बात है!

शरद कोकास said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
सबसे अच्छी पँक्ति ....

ओशो रजनीश said...

प्यास बुझाने को मयखाने भी कहाँ बचे साकी
छू भी लें तो वो एहसास कहाँ बचे बाकी.

अच्छी पंक्तिया ........

इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

बेचैन आत्मा said...

..मिलन में 'मैं' ही तो बाधा है.
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाहीं
सब अंधियारा मिटि गया, दीपक देख्या माहीं।

कुमार राधारमण said...

"मैं" है,इसलिए मिलना सदैव असम्भव था। वह भाव मात्र तिरोहित हो जाए,फिर किसी प्रयास की ज़रूरत नहीं।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

मन को छू गये भाव।
................
खूबसरत वादियों के इस जीव को पहचानते हैं?

विनोद कुमार पांडेय said...

टूटे खिलोने भी कहीं जुडा करते हैं भला..
फैंक दो दिल से कहीं दूर, चुभ ना जाए कहीं.

बहुत सुंदर अनामिका जी....सुंदर रचना

डॉ० डंडा लखनवी said...

शॄंगार रस से ओतपोत प्रभावकारी रचना

monali said...

Sundar rachna...

iqbal uboveja said...

beautiful words relly every line is in balance and words touches to the heart.ah murde ka kafan hun jisme jebe nahi ho ti kya bbat hai wonder ful line
par tum to ho wo mashal jo andhere me roshni kar sako

ज्योति सिंह said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं.
bahut hi khoobsurat ,wo nasamjh hote jo pyaar ki kadra nahi karte hai aur sachchi bhavnao ko nahi padh paate .mujhe ek gaana yaad aa raha -jaane kyo log mohbbat kiya karte hai ....................

Kailash C Sharma said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती ....
बहुत ही गहन और दिल को उद्वेलित करनेवाली अनुभूति.......बहुत सुन्दर...

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

बहुत ही उम्दा ....बहुत ही उम्दा रचना .
सभी पंक्तियाँ एक से बढ़कर एक हैं .
आभार .

Parul said...

superb!

ओशो रजनीश said...

अच्छी पंक्तिया ........

यहाँ भी आये एवं कुछ कहे :-
समझे गायत्री मन्त्र का सही अर्थ

sada said...

मुर्दे का कफ़न हूँ मैं भी जिसमें जेबें नहीं होती
मुंदी पलकों का अश्क हूँ जिसमें तपिश नहीं होती ।


सुन्‍दर शब्‍दों का साथ लिये हुये, बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

rashmi ravija said...

छोडो रहने भी दो क्या जिरह करें साकी
अब मेरी 'मैं' तुम्हारी 'मैं ' से मिलते नहीं
बेमिसाल पंक्तियाँ हैं ...सुन्दर कविता

sandhyagupta said...

सुन्दर,भावपूर्ण और प्रभावी अभिव्यक्ति.ढेरों शुभकामनायें.

mridula pradhan said...

bahot sunder.