Friday, 29 April 2011

आज की ये रात गुज़र जाने दे ..

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आज की ये रात गुज़र जाने दे 
जितने भी आंसू दफ़न हैं सीने में 
सब इस गम पर बह जाने दे. 

तू न रोया तो, सकूँ ना मिलेगा तुझे 
कतरा - कतरा मन के लावे को 
आँखों से निकल जाने दे.

ना टूट जाना कहीं,
ना बिखरना कभी..
तू टूटा तो ये चमन उजड़ जायेंगे 
बिछड़ जायेंगी पत्तियां पेड़ से...
फूल मुरझा जायेंगे..
फिर तू ही बता कि..
बागबान किसको कह पाएंगे..
आज की रात ये बस 
गुज़र जाने दे.

जमाने का क्या है 
रोज़ नए रंग हैं इसके 
मतलब तक ही सब 
बस बनते हैं अपने.

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको 
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको 

कल तक जो इन राहों को 
तकते नहीं थे..
आज राहें जुदा हैं तो..
बिलबिलाते हैं दुखी हो .

जीने का हक़ मिले सब को
ये चाहते नहीं हैं.
कोई खुश क्यों है...
यूँ जलते बहुत हैं.

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे 
आज की ये रात गुजर जाने दे .


69 comments:

Kailash C Sharma said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .

आज की स्वार्थी दुनियां का बहुत सार्थक चित्रण..बहुत सुन्दर

मनोज कुमार said...

आपकी इस रचना को पढ़कर एक शे’र मन में आया ...

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया,
पत्‍थर को बुत की शक्‍ल में लाने का शुक्रिया।
सूखा पुराना जख्‍म, नए को जगह मिली।
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया।

निशांत said...

ना टूट जाना कहीं,
ना बिखरना कभी..
तू टूटा तो ये चमन उजड़ जायेंगे
बिछड़ जायेंगी पत्तियां पेड़ से...
फूल मुरझा जायेंगे..
फिर तू ही बता कि..
बागबान किसको कह पाएंगे..
आज की रात ये बस
गुज़र जाने दे.

bahut sunder rachna aur ye panktiyaan mujhe acchi lagi..

Anand Dwivedi said...

कल तक जो इन राहों को
तकते नहीं थे..
आज राहें जुदा हैं तो..
बिलबिलाते हैं दुखी हो .
..............

कोई खुश क्यों है...
यूँ जलते बहुत हैं.

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे ...
bahut sundar rachna Anamika ji..bahut bahut dhanyavaad !

संजय भास्कर said...

जीने का हक़ मिले सब को
ये चाहते नहीं हैं.
कोई खुश क्यों है...
यूँ जलते बहुत हैं.
एक सम्पूर्ण पोस्ट और रचना!
यही विशे्षता तो आपकी अलग से पहचान बनाती है!

Amrita Tanmay said...

raat ke gujar jaane ke baad ....chamkile suraj ki tarah...behad khubsurat

सुमन'मीत' said...

ati sundar ji....

Sunil Kumar said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति, रचना की विशेषता अंत तक बांधें रखती है, बधाई........

anupama's sukrity ! said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .

रात गुज़र जाने दे ...!!
दिन तो फिर निकलेगा ही ....!!
bahut sunder rachna .

Sadhana Vaid said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.
बहुत सुन्दर पक्तियां हैं अनामिका जी ! जीवन की गहन सचाई और दर्द छिपा है इन पंक्तियों में ! बहुत भावपूर्ण और हृदयस्पर्शी रचना है ! मेरी बधाई स्वीकार करें !

प्रवीण पाण्डेय said...

यह धैर्य और यह सहनशीलता न्याय करेगी।

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

बिलकुल सही ... सुंदर भावाभिव्यक्ति

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

यही चलन है ..रात गुज़रने के बाद फिर नए दिन की शुरुआत होगी ...अच्छी रचना

राज भाटिय़ा said...

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको
वाह क्या बात कही आप ने, सहमत हे जी आप की रचना से, धन्यवाद

सतीश सक्सेना said...

अक्सर दर्दनाक रचनाये दे रही हो ...कभी स्वाद बदलना भी चाहिए ! शुभकामनायें !!

Dr Varsha Singh said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .

लाजवाब, सुन्दर लेखनी को आभार...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.
अनामिका जी,
इन पंक्तियों में सब कुछ कह दिया आपने.

वाणी गीत said...

सब्र कर ये रात गुजर जाने दे ...
आंसुओं से भरी कितनी ही लम्बी रात हो , गुजर ही जाती है ...
इसलिए नयी सुबह के इन्तजार की रौशनी भी है इनमे ...

Kunwar Kusumesh said...

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको

बिलकुल सही कहा है आपने.
मेरे ब्लॉग पर बहुत दिनों से आपका नहीं हुआ.

Rajesh Kumari said...

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको

कल तक जो इन राहों को
तकते नहीं थे..
आज राहें जुदा हैं तो..
बिलबिलाते हैं दुखी हो .aaj ke vaqt ko sahi darpan dikhaya hai....ye dunia yesi hi hai...matlabi
bahut achchi prastuti hai.

वन्दना said...

ज़िन्दगी की सच्चाइयां उतार दी हैं।

इमरान अंसारी said...

बहुत खुबसूरत.......नयी आशा का संचार करती है ये पोस्ट साचा है रात के बाद ही सवेरा होता है......प्रशंसनीय |

नीरज गोस्वामी said...

कमाल की रचना..शब्द और भाव दोनों अद्भुत पिरोये हैं आपने...बधाई स्वीकारें
नीरज

ehsas said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .

इन्ही दो लाइनो में सारी कविता का सार है।

OM KASHYAP said...

wah bahut sunder
sochta hoon itna accha kaise likha jata hein badhai

अमित श्रीवास्तव said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.


this is bitter fact,very nice.

मदन शर्मा said...

तू टूटा तो ये चमन उजड़ जायेंगे
बिछड़ जायेंगी पत्तियां पेड़ से...
फूल मुरझा जायेंगे..
फिर तू ही बता कि..
बागबान किसको कह पाएंगे..
बहुत खुबसूरत......ज़िन्दगी की सच्चाइयां उतार दी हैं
प्रशंसनीय....

Dinesh pareek said...

आप की बहुत अच्छी प्रस्तुति. के लिए आपका बहुत बहुत आभार आपको ......... अनेकानेक शुभकामनायें.
मेरे ब्लॉग पर आने एवं अपना बहुमूल्य कमेन्ट देने के लिए धन्यवाद , ऐसे ही आशीर्वाद देते रहें
दिनेश पारीक
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html

हरकीरत ' हीर' said...

अच्छी रचना ....

अगर आप क्षणिकायें लिखती हैं तो .......
कुछ दस, बारह बेहतरीन क्षणिकायें 'सरस्वती -सुमन' पत्रिका के लिए
अपने संक्षिप्त परिचय और छाया चित्र के साथ यहाँ भेजें ....

harkiratheer@yahoo.in

JHAROKHA said...

anamika ji
jivan ki sachchai ko har panktiyon me utaar kar rakh diya hai aapne.bahut hi lazwaab


जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको
bilkul jamaane ka dastur aaj -kal yahi hai
bahut hi sateek avam sarthak prastuti ke liye
bahut bahut badhai
poonam

kshama said...

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको

कल तक जो इन राहों को
तकते नहीं थे..
आज राहें जुदा हैं तो..
बिलबिलाते हैं दुखी हो .
Kya khoobsoorateese zindagee kee asliyat se ru-b-ru kara diya!

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को बड़ी बेबाकी और खूबसूरती से बयाँ करती हुई आपकी रचना सार्थक जीवन सन्देश देती है |

Rachana said...

तू पीछे था इनके तो..
दुत्कारते थे तुझको
आज है जरुरत तो..
पुकारते हैं तुझको
aaj ki duniya me aesa hi hota hai.
sahi likha hai aapne
rachana

prerna argal said...

bahut hi sunder rachanaa.jarurat per hi log aapko pukarte hai.nahin to muha mod ker vchale jaate hain.aaj kal ki swarthi duniya ka sahi chitraan.badhaai aapko

please visit my blog www.prernaargal.blogspot.com

daanish said...

भावनाओं में सिमटे दर्द
और जिंदगी की कशमकश का
बहुत सटीक चित्रण ......

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

श्रीमान जी, मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

Yogesh Amana said...

Bahut sundar

रचना दीक्षित said...

आज की ये रात गुज़र जाने दे
जितने भी आंसू दफ़न हैं सीने में
सब इस गम पर बह जाने दे.

जिंदगी की कशमकश का बहुत सटीक चित्रण. बहुत सुंदर लगी यह कविता. देरी से आने के लिए क्षमा चाहती हूँ.

Rakesh Kumar said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आकर आपकी भावपूर्ण रचना को पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ.अंतर्मन की कशिश को बहुत खूबसूरती से उकेरा है आपने. सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.आपका हार्दिक स्वागत है.

विशाल said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .

बहुत खूब.
उम्मीद की किरण यूं ही जगाये रखिये,

Vivek Jain said...

बहुत सुन्दर,
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर अभिव्यक्ति, शब्द और भाव दोनों बहुत सुन्दर

लिखती रहिये...

Babli said...

बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

श्रीमान जी, क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार ""आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें"" हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है. मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग www.rksirfiraa.blogspot.com पर टिप्पणी करने एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.

श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी कल ही लगाये है. इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ. आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

Minakshi Pant said...

तू भी सब्र कर बस वक्त आने दे
आज की ये रात गुजर जाने दे .
आज के माहोल पर एक सुन्दर कटाक्ष |
खुबसूरत रचना |
एक शेर अर्ज़ है ::::::::::
चोट पे चोट दिल पे खाए हुए
लब फिर भी हैं मुस्कुराये हुए
इन हसीं वादियों में बैठी हूँ
प्यार की शम्मा जलाये हुए |

रजनीश तिवारी said...

बहुत अच्छी लगी आपकी ये रचना

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

प्रिय दोस्तों! क्षमा करें.कुछ निजी कारणों से आपकी पोस्ट/सारी पोस्टों का पढने का फ़िलहाल समय नहीं हैं,क्योंकि 20 मई से मेरी तपस्या शुरू हो रही है.तब कुछ समय मिला तो आपकी पोस्ट जरुर पढूंगा.फ़िलहाल आपके पास समय हो तो नीचे भेजे लिंकों को पढ़कर मेरी विचारधारा समझने की कोशिश करें.
दोस्तों,क्या सबसे बकवास पोस्ट पर टिप्पणी करोंगे. मत करना,वरना......... भारत देश के किसी थाने में आपके खिलाफ फर्जी देशद्रोह या किसी अन्य धारा के तहत केस दर्ज हो जायेगा. क्या कहा आपको डर नहीं लगता? फिर दिखाओ सब अपनी-अपनी हिम्मत का नमूना और यह रहा उसका लिंक प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से
श्रीमान जी, हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु सुझाव :-आप भी अपने ब्लोगों पर "अपने ब्लॉग में हिंदी में लिखने वाला विजेट" लगाए. मैंने भी लगाये है.इससे हिंदी प्रेमियों को सुविधा और लाभ होगा.क्या आप हिंदी से प्रेम करते हैं? तब एक बार जरुर आये. मैंने अपने अनुभवों के आधार आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें हिंदी लिपि पर एक पोस्ट लिखी है.मुझे उम्मीद आप अपने सभी दोस्तों के साथ मेरे ब्लॉग एक बार जरुर आयेंगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ.
अगर आप चाहे तो मेरे इस संकल्प को पूरा करने में अपना सहयोग कर सकते हैं. आप द्वारा दी दो आँखों से दो व्यक्तियों को रोशनी मिलती हैं. क्या आप किन्ही दो व्यक्तियों को रोशनी देना चाहेंगे? नेत्रदान आप करें और दूसरों को भी प्रेरित करें क्या है आपकी नेत्रदान पर विचारधारा?
यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.? कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?

वीना said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

यही तो दुनिया है और दुनिया में रहने के अनुभव...

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह..कितनी सुंदर अभिव्यक्ति... अच्छी कविता..धन्यवाद

BrijmohanShrivastava said...

सुर नर मुनि सबकी यह रीती
स्वारथ लाग करइ सब प्रीती
कल तक तो इन राहों को तकते नहीं थे आज राहे अलग है तो दुखी है इस का अर्थ मुझे स्पष्ट नहीं हो पाया है ।
मतलब की बात ---
घर वालों ने प्यार जता कर गैरों ने मक्कारी से
मुझको तो मिल जुल कर लूटा सबने बारी बारी से

Rakesh Kumar said...

मेरे ब्लॉग पर मेरी नई पोस्ट आपका इंतजार कर रही है.'सरयू' स्नान का न्यौता है आपको.कृपया भूलिएगा नहीं.

विवेक मिश्र said...

जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों को बेबाकी और खूबसूरती से बयाँ करती रचना सार्थक जीवन सन्देश देती है |

Sachin Malhotra said...

जीने का हक़ मिले सब को
ये चाहते नहीं हैं.
कोई खुश क्यों है...
यूँ जलते बहुत हैं.

बहुत बढ़िया..!
मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है : Blind Devotion

somali said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

bahut sahi kaha hai aapne mama yahan sab matlab tak hi apne hain

Richa P Madhwani said...

http://shayaridays.blogspot.com

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

khoobsoorat rachna....
bahut dino baad blog par aa paya...

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

लीगल सैल से मिले वकील की मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है

मैंने दिल्ली पुलिस के कमिश्नर श्री बी.के. गुप्ता जी को एक पत्र कल ही लिखकर भेजा है कि-दोषी को सजा हो और निर्दोष शोषित न हो. दिल्ली पुलिस विभाग में फैली अव्यवस्था मैं सुधार करें

कदम-कदम पर भ्रष्टाचार ने अब मेरी जीने की इच्छा खत्म कर दी है.. माननीय राष्ट्रपति जी मुझे इच्छा मृत्यु प्रदान करके कृतार्थ करें मैंने जो भी कदम उठाया है. वो सब मज़बूरी मैं लिया गया निर्णय है. हो सकता कुछ लोगों को यह पसंद न आये लेकिन जिस पर बीत रही होती हैं उसको ही पता होता है कि किस पीड़ा से गुजर रहा है.

मेरी पत्नी और सुसराल वालों ने महिलाओं के हितों के लिए बनाये कानूनों का दुरपयोग करते हुए मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज करवा दिए..मैंने पत्नी की जो मानसिक यातनाएं भुगती हैं थोड़ी बहुत पूंजी अपने कार्यों के माध्यम जमा की थी.सभी कार्य बंद होने के, बिमारियों की दवाइयों में और केसों की भागदौड़ में खर्च होने के कारण आज स्थिति यह है कि-पत्रकार हूँ इसलिए भीख भी नहीं मांग सकता हूँ और अपना ज़मीर व ईमान बेच नहीं सकता हूँ.

anu said...

तू न रोया तो, सकूँ ना मिलेगा तुझे
कतरा - कतरा मन के लावे को
आँखों से निकल जाने दे.

शानदार रचना ...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने.
-------------------------------------
कल 17/06/2011 को आपकी कोई पोस्ट नयी-पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है.
आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत है .

धन्यवाद!
नयी-पुरानी हलचल

Kunwar Kusumesh said...

खूब लिखा है लिखती रहना.
उदगारों को कहती रहना.

रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा" said...

मेरा बिना पानी पिए आज का उपवास है आप भी जाने क्यों मैंने यह व्रत किया है.

दिल्ली पुलिस का कोई खाकी वर्दी वाला मेरे मृतक शरीर को न छूने की कोशिश भी न करें. मैं नहीं मानता कि-तुम मेरे मृतक शरीर को छूने के भी लायक हो.आप भी उपरोक्त पत्र पढ़कर जाने की क्यों नहीं हैं पुलिस के अधिकारी मेरे मृतक शरीर को छूने के लायक?

मैं आपसे पत्र के माध्यम से वादा करता हूँ की अगर न्याय प्रक्रिया मेरा साथ देती है तब कम से कम 551लाख रूपये का राजस्व का सरकार को फायदा करवा सकता हूँ. मुझे किसी प्रकार का कोई ईनाम भी नहीं चाहिए.ऐसा ही एक पत्र दिल्ली के उच्च न्यायालय में लिखकर भेजा है. ज्यादा पढ़ने के लिए किल्क करके पढ़ें. मैं खाली हाथ आया और खाली हाथ लौट जाऊँगा.

मैंने अपनी पत्नी व उसके परिजनों के साथ ही दिल्ली पुलिस और न्याय व्यवस्था के अत्याचारों के विरोध में 20 मई 2011 से अन्न का त्याग किया हुआ है और 20 जून 2011 से केवल जल पीकर 28 जुलाई तक जैन धर्म की तपस्या करूँगा.जिसके कारण मोबाईल और लैंडलाइन फोन भी बंद रहेंगे. 23 जून से मौन व्रत भी शुरू होगा. आप दुआ करें कि-मेरी तपस्या पूरी हो

वीना said...

जमाने का क्या है
रोज़ नए रंग हैं इसके
मतलब तक ही सब
बस बनते हैं अपने.

आज की तो यही दुनिया है ....स्वार्थ ही स्वार्थ है...
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति...

Udan Tashtari said...

aaj kal likhna kyun band hai? sab thik thak to hai na?

संतोष कुमार said...

bahut sundar rachna
Anamika ji..bahut bahut
dhanyavaad !

संतोष कुमार said...

bahut sundar rachna
Anamika ji..bahut bahut
dhanyavaad !

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

तू न रोया तो, सकूँ ना मिलेगा तुझे
कतरा - कतरा मन के लावे को
आँखों से निकल जाने दे.

dubaara tippani karna pad raha hai.....

mgar kahna hoga bahut hi uchh star ki rachna....

behad behad khooobsoorat!!!!!!!!

"ye raat to guzar jayegi magar,
aur bhi raaton ka aana abhi baaki hai"!!!

Dilip said...

u r writting very well.