Tuesday, 4 October 2011

अश्रु आहड़





मैं ही शायद 
तुम्हें नहीं समझ पायी.
तुमने तो पहले ही दिन 
मुझे अश्रु  आहड़ भेंट किया था,
प्रणय निवेदन से अब तक  सतत  
भरती आई हूँ उसे 
तुम्हारी ही कृपा से .




लेकिन बहुत बार ऐसा भी हुआ 
कि तुमने उसमें  
अनुराग की सुगंध इतनी भरी   
कि मैं पागल हिरणी सी 
मृगतृष्णा लिए 
तुम्हारे पीछे 
आकुल, व्याकुल सी 
मंजिल से भटके 
पथिक की भाँती 
दौड़ती चली गयी.

लेकिन क्या मिला मुझे
इस मरुस्थल में ?
उस सुवास  को  
पा लेने की जिद्द 
और इस इन्तजार के 
घने जंगलों में 
छटपटाते हुए 
बेबस हो, मैं .....
अनवरत 
सूखती चली गयी .

आज भी मैं  
अपने सूख चुके 
जर्द अरमानों 
की तडतड़ाहट का 
शोर सुन - सुन कर 
तड़प उठती  हूँ.

आज तुम्हारे 
भेंट किये गए  
अश्रु आहड़ से 
अविरल प्रवाह को 
रोकने का 
ना कोई 
ओर मिलता है 
ना कोई छोर 
क्यूंकि ...
मुझमे इतना 
भी  साहस  
नहीं  कि
इस भेंट को 
अपने सूने पन
की समाधि पर 
होम कर दूँ.


36 comments:

Manish Kr. Khedawat " मनसा " said...

bahut sunder !
dard jaise yahi uter pada hain

इमरान अंसारी said...

बहुत खूबसूरत अहसास समेटे ये पोस्ट लाजवाब है |

प्रवीण पाण्डेय said...

मन की पीड़ा रिस रिस बहती।

वन्दना said...

नारी मन की पीडा को खूबसूरती से उभारा है।

मनोज कुमार said...

इस कविता में आपकी गहरी संवेदना, अनुभव और अंदाज़े बयां खुलकर प्रकट हुए हैं। इसका शिल्प सलीक़ेदार, प्रखर और प्रभावी है। पढकर ऐसा लगता कि बहुत आत्मीयता से आप अपनी बात कह रही हैं। यह एक ऐसी संवेद्य कविता है जिसमें दर्द का मूक पक्ष भी बिना शोर-शराबे के कुछ कह कर पाठक को स्पंदित कर जाता है।

Mukesh Kumar Sinha said...

मुझमे इतना
भी साहस
नहीं कि
इस भेंट को
अपने सूने पन
की समाधि पर
होम कर दूँ.
.

bahut khub! sach me peeda dikh rahi hai....

रश्मि प्रभा... said...

bahut badhiyaa

Kailash C Sharma said...

मुझमे इतना
भी साहस
नहीं कि
इस भेंट को
अपने सूने पन
की समाधि पर
होम कर दूँ.

...बहुत मर्मस्पर्शी अहसास और उनकी प्रभावी अभिव्यक्ति..आभार

प्रेम सरोवर said...

लेकिन क्या मिला मुझे
इस मरुस्थल में ?
उस सुवास को
पा लेने की जिद्द
और इस इन्तजार के
घने जंगलों में
छटपटाते हुए
बेबस हो, मैं .....
अनवरत
सूखती चली गयी .

अनानिका जी ,
एक कहावत है - " मिर्चा जितना ही सूखता है उतना ही तिक्त होता है । " संवेदना से पूर्ण आपकी अभिव्यक्ति मन को एक सहज आत्मीय आनंद से प्रभावित कर गयी । जिंदगी में कभी - कभी ऐसा भी होता है । सघन भावों से भरी आपकी अभिव्यक्ति अच्छी लगी ।
धन्यवाद ।

Sadhana Vaid said...

बहुत दर्द भरा है आपकी रचना में ! मरीचिकाओं के पीछे भागने का दर्द कैसा होता है आपकी प्रखर लेखनी ने जीवंत कर दिया है ! और मन को कहीं बहुत गहरे द्रवित कर गया है ! बड़ी आत्मीय एवं अन्तरंग सी लगी यह रचना ! सुन्दर लेखन के लिये बधाई स्वीकार करें !

रचना दीक्षित said...

अनुराग कि सुंगंध सब से तेज होती है जिससे आसानी से पीछा नहीं छूटता. भावपूर्ण प्रस्तुति.

बधाई.

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर" Dr.Rajendra Tela,Nirantar" said...

इस भेंट को
अपने सूने पन
की समाधि पर
होम कर दूँ.
very nice

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

स्त्री मन की पीड़ा उकेरते शब्द..... गहन अभिव्यक्ति....

वाणी गीत said...

मृगतृष्णा तो यूँ भी भ्रम ही है , फिर इसका मातम क्यों ...
बहरहाल, कविता में दर्द की सघन अनुभूतियां हैं !

Patali-The-Village said...

बहुत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति|
आप को दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएँ|

Anita said...

दर्द से भीगी कविता... दर्द के पंक से ही प्रेम का कमल खिलता है... आभार!

monali said...

behad khubsoorat kavita.. :)

Amrita Tanmay said...

उम्दा और लाजबाब

कुमार राधारमण said...

कुछ-कुछ कमी दोनों ओर से रही होगी।

Sunil Kumar said...

गहरी संवेदना की सुंदर अभिव्यक्ति बधाई

हेमंत कुमार दुबे (Hemant Kumar Dubey) said...

अंतर्मन की पीड़ा को व्यक्त करती भावपूर्ण कविता|

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

NICE.
--
Happy Dushara.
VIJAYA-DASHMI KEE SHUBHKAMNAYEN.
--
MOBILE SE TIPPANI DE RAHA HU.
ISLIYE ROMAN ME COMMENT DE RAHA HU.
Net nahi chal raha hai.

M VERMA said...

आज भी मैं
अपने सूख चुके
जर्द अरमानों
की तडतड़ाहट का
शोर सुन - सुन कर
तड़प उठती हूँ.
एहसास के बहुत करीबी स्वर ..
शानदार अभिव्यक्ति

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर रचना....

क्षितिज रंजन अर्थात knight of royal society said...

अदभुत

सागर said...

ati sundar...

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

उम्दा रचना...बधाई.
संवाद मीडिया के लिए रचनाएं आमंत्रित हैं...
विवरण जज़्बात पर है
http://shahidmirza.blogspot.com/

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

दिल के अरमां आंसुओं में बह गए,
हम वफ़ा करके भी तनहा रह गए!!
भग्न ह्रदय से रक्त का रिसाव प्रायः नयन से अश्रु के रिसाव के रूप में प्रकट होता है और वह आपकी इस कविता में पूर्णतया अभिव्यक्त हो रहा है!!

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

भावभरी खुबसूरत कविता

विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

लेकिन बहुत बार ऐसा भी हुआ
कि तुमने उसमें
अनुराग की सुगंध इतनी भरी
कि मैं पागल हिरणी सी
मृगतृष्णा लिए
तुम्हारे पीछे
आकुल, व्याकुल सी
मंजिल से भटके
पथिक की भाँती
दौड़ती चली गयी..behtarin panktiyan..sadar badhayee aaur amantran ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

लेकिन बहुत बार ऐसा भी हुआ
कि तुमने उसमें
अनुराग की सुगंध इतनी भरी
कि मैं पागल हिरणी सी
मृगतृष्णा लिए
तुम्हारे पीछे
आकुल, व्याकुल सी
मंजिल से भटके
पथिक की भाँती
दौड़ती चली गयी..behtarin panktiyan..sadar badhayee aaur amantran ke sath

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

लेकिन बहुत बार ऐसा भी हुआ
कि तुमने उसमें
अनुराग की सुगंध इतनी भरी
कि मैं पागल हिरणी सी
मृगतृष्णा लिए
तुम्हारे पीछे
आकुल, व्याकुल सी
मंजिल से भटके
पथिक की भाँती
दौड़ती चली गयी..behtarin panktiyan..sadar badhayee aaur amantran ke sath

JHAROKHA said...

Anamika ji,bhavnaon ki bahut sahaj abhivyakti....
Poonam

Unlucky said...

I know i am so late to read this post. but thank you for this excellent information. I hope to get a lot of good information like this here

जगजीत सिंह आधुनिक गजल गायन की अग्रणी है.एक ऐसा बेहतरीन कलाकार जिसने ग़ज़ल गायकी के सारे अंदाज़ बदल दिए ग़ज़ल को जन जन तक पहुचाया, ऐसा महान गायक आज हमारे बिच नहीं रहा,
उनके बारे में और अधिक पढ़ें : जगजीत सिंह

JHAROKHA said...

anamika ji
dil kebhige hue jajbaaton ko aapne bahut hi behatareen shabdon me piroya hai.
aisa lagta hai ki main bhi iske charon or bhatak rahi hi.
man ko chhoti hui anuthi prstuti
badhai
poonam

कौशल किशोर said...

आज भी मैं
अपने सूख चुके
जर्द अरमानों
की तडतड़ाहट का
शोर सुन - सुन कर
तड़प उठती हूँ.

wah wah...bahut sundar..