Tuesday, 11 October 2011

कमल के फूल




क्यों इक हूक सी 
दिल में उठती है,
क्यों इक आस, सदा 
ताना-बाना बुनती है 
जितना भी निचोड़ दूँ 
दिल को 
हर सोच तुझ पर ही 
आकर क्यों रूकती है ?

क्या मैंने कभी 
जफा की थी ?
क्या मैंने कभी
बेरुखी दी थी ?
क्या मैंने चुभाये थे 
कभी नश्तर ?
क्या मैंने हिज्र की 
सर्द कोई शब् दी थी ?

missing-you-wallpaper.jpg image by foxterier

फिर क्यों मेरे 
नसीब के कागज़ पर 
तूने तमाम दर्द 
लिख डाले ?
क्यों मेरी पेशानी पर ही 
बदकिस्मती  के 
नक़्शे गढ़ डाले ?

मैं हर लम्हा 
क्यों इंतजार में जलती हूँ ?
तुझे मुझसे प्यार नहीं, तो 
मैं क्यों इस प्यार में 
सिसकती हूँ ?




क्यों फूट आते है 
वेदना के ये बूटे 
बार - बार 
मेरे मन की ओढनी पर 
देख जिन्हें मैं दिन रात 
आराम अपना  
खो देती हूँ 
और फिर  से  
समझाती हूँ दिल को 
हर - बार 
कि क्यों कमल के 
फूलों से 
प्यार की खुशबू 
की आशा रखती हूँ.


34 comments:

Unknown said...

बहुत सुन्दर रचना | भावपूर्ण |
आभार |
मेरे ब्लॉग में भी पधारें |
मेरी कविता

प्रवीण पाण्डेय said...

दर्द में डुबोयी पंक्तियाँ।

नीरज गोस्वामी said...

बहुत ही भावपूर्ण रचना...बधाई स्वीकारें

नीरज

M VERMA said...

कि क्यों कमल के
फूलों से
प्यार की खुशबू
की आशा रखती हूँ.
एहसास की सुन्दर रचना

Prem Prakash said...

जितना भी निचोड़ दूँ दिल को हर सोच तुझ पर ही आकर क्यों रूकती है...भावपूर्ण रचना...!!!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

गहन ... भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Satish Saxena said...

अपनी अपनी किस्मत ....
शुभकामनायें !

मनोज कुमार said...

इस रचना की संवेदना और शिल्पगत सौंदर्य मन को भाव विह्वल कर गए हैं। आत्मचिंतन से उपजी मार्मिक कविता है।

रचना दीक्षित said...

आपने दर्द की वारिश सी कर दी. सारी वेदना को कविता में उंढेल कर सुंदर कविता का रसास्वादन कराया है. बहुत उत्तम.

sushmaa kumarri said...

क्यों इक हूक सी
दिल में उठती है,
क्यों इक आस, सदा
ताना-बाना बुनती है
जितना भी निचोड़ दूँ
दिल को
हर सोच तुझ पर ही
आकर क्यों रूकती है ?बहुत बहुत ही खुबसूरत.....

वाणी गीत said...

कमल के फूल से प्यार की खुशबू की आस ....

एहसासों का दर्द जी जलाता है!

Sadhana Vaid said...

बहुत बहुत बहुत खूबसूरत ! हर पंक्ति मन की गहराइयों से निकली प्रतीत होती है और हर शब्द मन की वेदना को मुखर कर रहा है !
हमने जफा न सीखी उनको वफ़ा न आई
पत्थर से दिल लगाया और दिल पे चोट खाई !

Atul Shrivastava said...

भावभरी रचना।

रश्मि प्रभा... said...

मैं हर लम्हा
क्यों इंतजार में जलती हूँ ?
तुझे मुझसे प्यार नहीं, तो
मैं क्यों इस प्यार में
सिसकती हूँ ?..........
प्रश्न गहरा है ................

अरुण चन्द्र रॉय said...

अत्यंत संवेदनशील रचना... बहुत बढ़िया....

vandan gupta said...

क्यों कमल के फूलों से प्यार की खुशबू की आशा रखती हूँ.
बहुत सुन्दर भावों को संजोया है ………ये मोहब्बत के इम्तिहान ऐसे ही होते हैं।

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

pyar veeran ko bhi gulistan bana deta hai...pyar shaita ko bhi insaan bana deta hai..pyar ko ijjat bhari nigah se dekho..pyar patthar ko bhi insaan bana deta hai..jo pighalata nahi amoonan hai ..pyar usko bhi pighla deta hai....har pankti me pura samarpan hai..ummid mat chodiye kamal ke phool se khusboo ki..sadar badhayee aaur amantran ke sath

Anonymous said...

सुन्दर भावों को दर्शाती एक सुन्दर पोस्ट|

Manish Kumar Khedawat said...

सुंदर :)
जाने क्यूँ पूछ रही ये सवाल आप यूं
क्या अभी तक भी आपने ये न जाना
मोहब्बत में तो दर्द खरीद के जीना होता हैं :'(

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है! वाह! बहुत सुन्दर प्रस्तुति बधाई

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) said...

वेदना को स्वर मिले.बहुत सुंदर.

सागर said...

bhaut hi sundar rachna abhivaykti....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

इन प्रश्नों के उत्तर मिल जाएँ तो दर्द ही नहीं रहेगा ... संवेदनशील प्रस्तुति

ashokbajajcg.com said...

बहुत भावपूर्ण रचना .

मन के - मनके said...

भाव-पूर्ण,प्रस्तुति

amrendra "amar" said...

सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब रचना लिखा है आपने ! शानदार प्रस्तुती

Anita said...

इसी को इश्क कहते हैं !

Maheshwari kaneri said...

बहुत बढ़िया | सुन्दर रचना
बधाई ||

सु-मन (Suman Kapoor) said...

dil ko choo gai ...is kyun ka uttar kabhi nahi milta...pyaar ka gam taaumr chlta rahta hai sath sath...

प्रेम सरोवर said...

मैं हर लम्हा
क्यों इंतजार में जलती हूँ ?
तुझे मुझसे प्यार नहीं, तो
मैं क्यों इस प्यार में
सिसकती हूँ ?
हम अपने जीवन के सफर में खुशियों की तलाश में अपनी जीवन बगिया को हरितिमा प्रदान करने के उद्देश्य से प्रेमरूपी मन से रिश्ता जोड़ लेते हैं- यह सोच कर कि इसमें हमें असीम शांति मिलेगी लेकिन जब सारी कल्पित बातें मन के अनुसार नही होती हैं तो उस समय हमें ऐसा प्रतीत होता है कि हमने अपनी सुंदर सी जिंदगी के साथ-साथ बेशकीमती समय को भी कही खो दिया । सुख की खोज में शांति और समय की खोज में जिंदगी के हसीन पल गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए बाध्य हो जाते हैं । प्रेम में दर्द के साथ खुशी का भी भावात्मक संबंध होता है । प्रेम सरोवर में स्नान करने के पश्चात जीवन के नए आयाम खुलने लगते हैं, नई दिशाएं बुलाने लगती हैं,रंगों में नए अर्थ प्रस्फुटित होने लगते हैं ।
बहुत दिनें के बाद एक अच्छी भावाभिव्यक्ति पढने को मिली । आपका उदगार बहुत ही मार्मिक एवं सुंदर लगा । मेरे पोस्ट पर आकर मेरा भी मनोबल बढ़ाएं । धन्यवाद ।

आशा बिष्ट said...

marmsparshi rachna....

kshama said...

मैं हर लम्हा
क्यों इंतजार में जलती हूँ ?
तुझे मुझसे प्यार नहीं, तो
मैं क्यों इस प्यार में
सिसकती हूँ ?
Bahut peeda hai is rachana me!

दिगम्बर नासवा said...

ऐसे बहुत से प्रश्न सताते हैं .. पर इनका जवाब किसी के पास नहीं होता ... दर्द छलकता है ...