Sunday, 2 May 2010

कुटज तरू सा मेरा मन






















मरू भूमि सी ऊष्ण
कठोर जिन्दगी की
विषम परिस्थितियों से
टकराता, गिरता पड़ता
चोटिल होता मेरा मन.

शिव की जटा-जूट सा
सूखा, नीरस
शिवालिक बना
ये मेरा मन.

कुटज तरु की भांति
फिर भी सदैव
मुस्कराने को तैयार
ये मेरा मन.

अलमस्त, अटखेलियाँ करता
अंतस में फैले अवसाद पर
कफ़न चढ़ाता ..
आगे बढ़ता..
मंद समीर सा बहता
भ्रमर गुंजन में
खुद को खोता
ये मेरा मन.

कृत्रिम आवरणों के
रेशे करता
कुछ कह जाता
नए रूप में
सजता- संवरता
अंततः ह्रदय विषाद को
मुक्ति देता
और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन.

34 comments:

sangeeta swarup said...

कुटज तरु की तरह
यूँ ही मन की
हर पंखुरी
पल्लवित होती रहे
और विषाद
को भी सजा
एक नयी कविता
बहती रहे .....

:):)

बहुत खूबसूरत कविता....वाह वाह वाह.......

M VERMA said...

और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन.

मन कविता में ढल जाये
तब शायद विषाद टल जाये
बहुत सुन्दर लिखा है आपने
बहुत सुन्दर

दिलीप said...

bahut khoob anamika ji dil khol ke rakh diya...

डॉ टी एस दराल said...

विपरीत परिथितियों में भी मुस्कराता रहे ये मन --यही सार्थक सोच है।
अच्छी लगी ये कविता ।
ब्लॉग पर पधारने के लिए दिल से आभार।

kshama said...

कृत्रिम आवरणों के
रेशे करता
कुछ कह जाता
नए रूप में
सजता- संवरता
अंततः ह्रदय विषाद को
मुक्ति देता
और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन.
Bahut,bahut sundar1

अरुणेश मिश्र said...

कुटज तरु सा........
और शिवालिक का प्रयोग मन की पावनता . सरसता और अदम्य जीवनी शक्ति की प्रतीति है ।
रचना की उदात्तता प्रणम्य है ।

BrijmohanShrivastava said...

अभिव्यक्ति पर विद्वानों के विचार पढ़ता रहता था आज इत्तेफाक से यह ब्लॉग खोल कर देखा अत्यंत प्रसन्नता हुई ।कुटज तरु पहली बार नाम सुना शायद केक्टस को कहते होंगे परिस्तिथि से टकराता ,गिरता,सूखा नीरस मन फिर भी मुस्कराने को तैयार "बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है यूं भी हालात से समझौता किया जाता है " की मानिन्द।अवसाद ,हताशा ,निराशा को कफ़न उड़ाने की अभिव्यक्ति अति सुन्दर रही ,ऐसा न किया तो मरुभूमि में जीना ,श्वास लेना मुश्कल हो जाता है अवसाद ,हताशा ,निराशा को कफ़न उड़ाने की अभिव्यक्ति अति सुन्दर रही ,ऐसा न किया तो मरुभूमि में जीना ,श्वास लेना मुश्कल हो जाता है ।विषाद को मुक्ति देकर ही प्रक्रति की सुन्दरता का वर्णन किया जा सकता ।वैसे तो विषाद और निराशा मे भी लिखा जा सकता है मगर फ़िर सुनने वाला यही कहता है "जब दिल की ।बात कह तो सभी दर्द मत उन्डेल /वरना कहेंगे लोग गज़ल है या मर्सिया ।जीवन को सही तरीके से जीने की प्रेरणा देती रचना बहुत अच्छीलगी

SAMVEDANA KE SWAR said...

जीवंत सम्वेदनाएँ...एक पूरी यात्रा का वर्णन कर दिया आपने जिनसे होकर एक कविता जन्म लेती है...

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' said...

अति सुन्दर ...........बहुत खूब ...

http://athaah.blogspot.com/2010/04/blog-post_29.html

Prem Farrukhabadi said...

अलमस्त, अटखेलियाँ करता
अंतस में फैले अवसाद पर
कफ़न चढ़ाता ..
आगे बढ़ता..
मंद समीर सा बहता
भ्रमर गुंजन में
खुद को खोता
ये मेरा मन.

bahut hi sundar bhav. Badhai!!

चन्दन कुमार said...

dhanyawad anamika ji... aapne meri kavita ko chhotigali.blogspot.com par saraha.

maafi chahunga but, sorry mai aapke orkut profile me nahin hu

बेचैन आत्मा said...

सुन्दर भाव जगाती मन को निर्मल करती कविता के लिए बधाई.

'अदा' said...

कृत्रिम आवरणों के
रेशे करता
कुछ कह जाता
नए रूप में
सजता- संवरता
अंततः ह्रदय विषाद को
मुक्ति देता
और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन

kootaj taru...naya naam suna ..
bahut hi sundar panktiyaan ...
aaj kal thodi vyast hun...
lekin padh liya hai..aur bahut pasand aaya...
bahut badhiya..

Udan Tashtari said...

अरे, मेरा प्यारा सा कमेंट कहाँ चला गया...बह्हू :(

Shekhar Kumawat said...

BAHUT KHUB

BADHAI AAP KO IS KE LIYE

वाणी गीत said...

चोटिल मन अवसाद पर मुस्कान की परत चढ़ा कविता रचता ...
जीना इसी का ही तो नाम है ...
बहुत सुन्दर गीत ...

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

o ri didi ... achha hai yah mann. man to aisa hi hota hai .. :)

kunwarji's said...

वाह!

कही से कुछ भी सोचे कवी-मन,

वहीँ से भाव बहने लगेंगे शब्द बन,

सही में,कविता ही भावो का श्रेष्ठ रूप है!यही जाना यहाँ आज इसे पढ़ कर.....बहुत बढ़िया जी,

कुंवर जी,

रचना दीक्षित said...

वाह !!!!!!!!! क्या बात है..... बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति, सकारात्मक बात

rashmi ravija said...

bahut hi sundar abhivyakti....man ki paraten kholti khubsoorat rachna

संजय भास्कर said...

फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

संजय भास्कर said...

... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन.....बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ..

सुमन'मीत' said...

क्या करें मन बावरा है

हर साँस पर बोझिल ये मन
सावन में भी प्यासा ये मन
लफ़्जों को ढूँढता ये मन
खाली पन्नों पर सिमटता ये मन

अजय कुमार said...

मन को छूने वाली मनभावन कविता

सुलभ § सतरंगी said...

ये मेरा मन.

मन की बात कह दी.

नारदमुनि said...

narayan narayan

हरकीरत ' हीर' said...

अंततः ह्रदय विषाद को
मुक्ति देता
और तब एक
कविता में ढल जाता
ये मेरा मन.

बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति .....!!

दिगम्बर नासवा said...

सच है मन तो उन्मुक्त पवन है ... बाँधना और एक दिशा निश्चित करना बहुत मुश्किल है .... सुंदर रचना ...

ज्योति सिंह said...

शिव की जटा-जूट सा
सूखा, नीरस
शिवालिक बना
ये मेरा मन.


कुटज तरु की भांति
फिर भी सदैव
मुस्कराने को तैयार
ये मेरा मन.
bahut khoobsurat bhav avam shabd ,ati uttam .

Avinash Chandra said...

कुटज तरु की भांति
फिर भी सदैव
मुस्कराने को तैयार
ये मेरा मन.


mujhe itni dder ho gayi aane me :(

maaf karein...
Bahut hi pyari aur manbhavan kavita

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

बहुत सुन्दर कविता है ... मन के कितने ही भाव को परिभाषित किये हैं आप ... बधाई !

Amitraghat said...

अद्भुत.."

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/