
सागर तो हू..
मगर सतह मरूस्थल सी है
और तासीर उस रेगीस्तान जैसी..
जो प्यासा है प्यार के लिए..
मै तुम से दूर रह कर
खुद को भुलाये रहता हू..
उमडते सागर की
कल-कल करती लहरो सा
लोगो की भीड में
सवयं को उलझाये रहता हू.
मगर पाता हू जब भी
तुम्हे अपने करीब..
भूल जाता हू सीमाये
बिखर जाता हू,
छुपा लेना चाहता हू खुद को
तुम्हारे दामन में.
पिघला देना चाहता हू..
जर्द पडी दिवारो की
बर्फ को..
गरम सांसो की महक में..
मुक्त होना चाहता हू
कुछ पलों के लिए
विषाक्त, छीछ्लेदार
जिंदगी की केंचुल से
मै जानता हू तुम्हारी सीमाये
मगर अनियंत्रित हो जाता हू
तुम्हारे सानिध्य में
तुम्हारे करीब आने की आकांक्षा
उदिग्न हो जाती है
और मन आत्म -समर्पण
में डूब जाता है.
मनः स्थिती की
इस यात्रा से गुजरता हुआ
मै खो देता हू
खुद के आत्म-बळ को
शरमिंदा हू मै स्वयं से
जो प्रेम लोलुपता में फसा
भूल जाता हू तुम्हारी बेबसी .
आज में पश्चाताप में डूबा हू..
अपनी क्षुद्रता के लिए
क्षमा याचना भी नही कर सकता
डूबा हू अपने ही अहम में..
और कुचला जा रहा हू..
खुद-ब- खुद ही
अपने संताप के पहियो में.
हो सके तो
मुझे क्षमा करना.