Tuesday 13 July 2010

निर्वाण



















तुम्हारा साथ पाने की
उद्विग्नता ...
हड्डियों के ढांचे से
चिपके मांस में
छिपी रक्त धमनियों को
उकसा देती है .

चाहतें परछाइयाँ बन कर
पीछा नहीं छोडती...
मानो तिल की तरह
शरीर पर पड कर
याद दिलाती रहती हैं...
अपने अधूरेपन का.

अन-बुझे अरमानों की
अकुलाहट
अस्त-व्यस्त करती है.

लेकिन ...

लेकिन ये सब सुख तो
क्षणिक हैं.
कुछ भी स्थायी तो नहीं है.

जब भी किसी सुख का
अंत होता है ..
तब अत्यंत दुख होता है.

मैं अब सुख की
कामना ही न करूँ
तो...
मुझे दुख ही ना मिलेगा.

मेरे अंदर की ये सोचें
मुझे व्यथित करती हैं.
मेरी चेतना....बोध कराती है
कि यथार्थ ...
कल्पनाओं से भिन्न है.

यथार्थ के इन संघर्षो में लीन
मेरे अंदर ही कोई
मुझे बतलाता है कि...
मैं एक खिलौना मात्र हूँ.

आज मैं ..
पागल व्यक्ति की तरह
विस्मृतियों में जाकर
खुद को
भुला देना चाहती हूँ.

मैं भी योगियों की तरह
समाधि की तरफ
अग्रसर हो....
सांसारिक कर्मों और
योनियों के
आवरणों से विरत हो ..
निर्वाण पा लेना चाहती हूँ.

49 comments:

सम्पादक, अपनी माटी said...

कविता अच्छी है.निर्वाण का मन बनाया है मगर मिलना कितना मुश्किल है जी.खैर,इतनी विरक्ति भी अची बात नहीं.यहाँ बहुत से शब्द ढूंढ के लिखे लगते हैं

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर रचना है!

देवेन्द्र पाण्डेय said...

ऎसी किंकर्तव्यविमूड़ता की स्थिति से गीता ही उबार सकती है.
.....वैचारिक मंथन कराती उम्दा पोस्ट.

kshama said...

Kaash! Nirvaan ki sthiti hame bina dardse guzre hasil ho!Aapki is rachana me kaafee peedaa hai!

Sunil Kumar said...

अन-बुझे अरमानों की
अकुलाहट
अस्त-व्यस्त करती है सुन्दर रचना

मनोज भारती said...

सुंदर बोधपूर्ण काव्य ...इहलोक के प्रिय से मिलन की चाहत पीड़ा ही देती है ...व्यक्ति का उपयोग खिलौने की तरह ही तो होता है ...हर चाहत एक दुख में परिणत हो जाती है ...अच्छा है आपको यह बोध हो रहा है ...शुभ है ...संसार की व्यर्थता जान लेना वैराग्य का पहला कदम है और पहला कदम सही उठा लिया जाए तो समाधि दूर नहीं । सुंदर अनुभुति

http://gunjanugunj.blogspot.com

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

चाहतें परछाइयाँ बन कर
पीछा नहीं छोडती...
मानो तिल की तरह
शरीर पर पड कर
याद दिलाती रहती हैं...
अपने अधूरेपन का.
..............................
अनामिका जी....बहुत ही गहरे भाव का समावेश है कविता में...
बधाई...इस सुन्दर लेखन के लिए.

RAJWANT RAJ said...

tumhe krni hai koshish
vo jmi bhi ab door nhi

jrra jrra hai muntjir
vo lmha bhi ab door nhi

lpk ke pkd lo
vo khushi bhi ab door nhi


kvita bhut umda hai mgr jb hm honge sath sal ke our tum hogi pchpn ki tb ye kvita post krna .slah hai .

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

इस असार संसार का बोध, निर्वाण और समाधि की अवस्था...प्रश्न सुख की कामना न होने से दुःख का अनुभव न होना नहीं, एक ऐसी अवस्था प्राप्त करना है जहाँ सुःख क्या और दुःख क्या का भेद ही समाप्त हो जाता है... सच कहा है आपने ऐसी स्थिति सिर्फ पागल ही होकर पाई जा सकती है... उस प्रियतम को पा लेने का पागलपन...बहुर सुंदर रचना, बहुत सुंदर भाव! (हिंदी में जवाब देने का कोसिस किए हैं, लेकिन पोस्ट हिंदी में लिखने का आपका अनुरोध स्वीकार नहीं कर पाएंगे, क्षमा कर दीजिएगा अऊर स्नेह बनाए रखिएगा)...

सु-मन (Suman Kapoor) said...

अंतस की खोज...........शायद जीवन को समझने की पहली सीढ़ी....... अच्छी लगी जीवन दर्शन दिखाती ये रचना...

रचना दीक्षित said...

मैं भी योगियों की तरह
समाधि की तरफ
अग्रसर हो....
सांसारिक कर्मों और
योनियों के
आवरणों से विरत हो ..
निर्वाण पा लेना चाहती हूँ.

बहुत ही लाजवाब है आपकी कविता. सारा का सारा जीवन दर्शन मिल गया इसी में. अच्छा लगा पढ़ कर

Deepak Shukla said...

Hi..

Sukh ki chahat taj den shayad..
Es se hi nirvaan mile..
Jeevan kantak path ho chahe..
Chalna jab tak praan rahe..

Sundar bhav..

Deepak..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लेकिन ये सब सुख तो
क्षणिक हैं.
कुछ भी स्थायी तो नहीं है.

जब भी किसी सुख का
अंत होता है ..
तब अत्यंत दुख होता है.

इतना ज्ञान रखने वाले की धमनियां क्यों उकसा जाती हैं?

और यहाँ हर इंसान खिलौना ही है...अपने दुखों से पीछा छुडाने के लिए निर्वाण कैसे मिलेगा ? इसके लिए तो निर्विकार भाव अपनाना होगा....

रचना बहुत सार्थक है

Sadhana Vaid said...

बड़ी दार्शनिकता से भरी रचना लिख डाली आपने ! इतनी विरक्ति की क्या आवश्यकता है ! निर्वाण पाना इतना सहज भी नहीं ! उसके लिये तो सुना है बड़े जप तप करने पड़ते हैं ! मेरी मानिए इन आधी अधूरी उपलब्धियों में ही सुख ढूँढने का प्रयास करिये शायद निर्वाण का द्वार अपने आप खुल जाये !

अमिताभ श्रीवास्तव said...

आपकी रचना बहुत अच्छी है। वैसे दर्शन की बात करती हुई इस रचना का एक पक्ष मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ मानों दुखों से दूर भागकर निर्वाण की सोच है। यह एकतरह का पलायन भी है। निर्वाण दुखों से दूर भागकर नहीं होता बल्कि दुखों में संलिप्त रह कर ही प्राप्त किया जाता है। जो जप तप हैं जो साधना है वो आसान जीवन नहीं बल्कि अथाह दुखों से लिपटा हुआ जीवन है, खैर..मगर रचना का स्वाद सचमुच आपकी अन्य रचनाओं से बेहतर लगा। कम से कम आपने पाठकों को सोचने और कहने का मौका तो दिया, इससे जीवन दर्शन की कुछ बातें भी सम्मुख आ जाती हैं।

सुधीर राघव said...

सुंदर।

Unknown said...

atyant anupam

pyaari kavita..........

Anupama Tripathi said...

बहुत सुंदर मनोभाव -
बहुत सुंदर रचना -
बधाई .

Anamikaghatak said...

क्या खूब लिखा है आपने .......लेखनी अति सुन्दर

Sumit Khanna said...

sundar kavita, dil ko bha gai anamika ji

Satish Saxena said...

यह आज क्या लिखा ?
ऐसे न सोचें ...सुख दुःख साथ साथ है और रहेंगे ..अपने कष्ट को अधिक क्यों मानें हर आदमी कष्ट में हैं ..भागिए नहीं ...
आप कमजोरों को रास्ता दिखाने के लिए हैं न कि रास्ता खुद भूल जाएँ !

निर्मला कपिला said...

लेकिन ये सब सुख तो
क्षणिक हैं.
कुछ भी स्थायी तो नहीं है.
अगर इस सूत्र को समझ लिया फिर कोई दुख नही कोई सुख नही सब कुछ स्वीकर्य है। बहुत अच्छी लगी रचना बधाई

मनोज कुमार said...

मैं अब सुख की
कामना ही न करूँ
तो...
मुझे दुख ही ना मिलेगा.
दिव्‍य गुण मानव को ईश्‍वर के समीप ले आते हैं जबकि विकार उसे ईश्‍वर से दूर ले जाते हैं।
हम सितारों की दूरी तथा समुद्र की गहराई का अन्‍वेषण करते हैं परन्‍तु हम कौन हैं तथा इस संसार में क्‍यों आये हैं, इस विषय में कितना जानते हैं?
जीवन को आबाद करना है तो मैं कौन हूँ इस पहेली को हल कीजिये। मैं और मेरे-पन के भान से मुक्‍त हो जाइये।

vandana gupta said...

सुख और दुख तो मन की स्थितियां हैं…………ये तो हमारे महसूस करने की क्षमता है ………………हम इनसे कितना उद्वेलित होते हैं .......और जहां तक निर्वाण की प्राप्ति का मार्ग है वो भी तो हमारे अन्तस से ही होकर गुजरता है……………बस एक पग बढाने की देर है फिर ये अन्तर्मन की व्यथा व्यथित नही करेगी।

हिंदी साहित्य संसार : Hindi Literature World said...

कविता और दर्शन का सुन्दर संगमन..बधाई.
_________________________
अब ''बाल-दुनिया'' पर भी बच्चों की बातें, बच्चों के बनाये चित्र और रचनाएँ, उनके ब्लॉगों की बातें , बाल-मन को सहेजती बड़ों की रचनाएँ और भी बहुत कुछ....आपकी भी रचनाओं का स्वागत है.

shikha varshney said...

काश इतना आसान होता निर्वाण पाना ...संवेदनशील रचना .

रश्मि प्रभा... said...

इतनी गूढ़ रचना .... मन खुश हो गया

संजय भास्‍कर said...

रचना बहुत सार्थक है

संजय भास्‍कर said...

बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..

सुज्ञ said...

शुभ भाव!!

आपके अन्तरमन में यह ज्योति सदैव प्रज्वल्लित रहे।

Dr. Zakir Ali Rajnish said...

मन के कोने तक उतर गयी कविता।
--------
पॉल बाबा की जादुई शक्ति के राज़।
सावधान, आपकी प्रोफाइल आपके कमेंट्स खा रही है।

दिगम्बर नासवा said...

आज मैं ..
पागल व्यक्ति की तरह
विस्मृतियों में जाकर
खुद को
भुला देना चाहती हूँ.

इंसान छाता तो है ... पर संभव कहाँ ....
जितना जीना है वो तो जीना ही पड़ता है ... दर्द है आपकी रचना में आज ....

अजित गुप्ता का कोना said...

बहुत श्रेष्‍ठ कविता। निर्वाण शब्‍द जैन धर्मावलम्‍बी प्रयोग में लाते हैं और उसका भावार्थ मोक्ष होता है। मोक्ष अर्थात जीवन-मरण से मुक्ति। कैसा दुर्भाग्‍य है कि शास्‍त्र कहता है कि महिला को मोक्ष नहीं होता इसके लिए पुरुष जन्‍म आवश्‍यक है। वैसे मैं कहती हूँ कि महिला सृजन करती है तो उसे किसी मोक्ष की आवश्‍यकता नहीं है। यदि सृजन करने वाले हाथ ही मोक्ष की ईच्‍छा रखने लगे तब तो सृजन कौन करेगा?

सुज्ञ said...

अजित जी,
यह भ्रांति है कि नारी को निर्वाण नहिं होता।
वस्तुतः यह मान्यता दिगम्बर जैनों में बाद में कभी आरोपित हो गई
है। श्वेताम्बर जैनों में तो नारी को मोक्ष भी है,एवं महिला तीर्थंकर पद प्राप्त भी कर सकती है।

राजकुमार सोनी said...

आपकी रचना की दार्शनिकता से मैं तो प्रभावित हूं.
बहुत ज्यादा इसलिए नहीं लिखूंगा क्योंकि ऊपर विद्धान साथियों ने काफी अच्छी बातें लिखी हैं.
फिर भी आपकी इस श्रेष्ठ रचना के लिए इतना जरूर कहूंगा कि
रचनाकार इस रचना के जरिए अपने असली वजूद की तलाश में हैं.
कमबख्त असली वजूद का ही तो पता नहीं चलता अंतिम दम तक.

VIVEK VK JAIN said...

aapke shabd 'mei jo b likhti hu dil k shukun k liye likhti hu achhe lage.

विनोद कुमार पांडेय said...

सुंदर.. प्रस्तुति..अनामिका जी शब्द और भावनाओं का सुंदर मिश्रण...बढ़िया रचना के लिए आभार

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι said...

भावपूर्ण रचना के लिये कोत्ल्श बधाई। देर से ब्लाग में पहुंचने के लिये मुआफ़ी।

राजेश उत्‍साही said...

असली निवार्ण तो इस जीवन को जीने में है। बहरहाल आपने अंदर का द्वंद्व बहुत प्रभावी ढंग से सामने रखा। पर एक बात कहना चाहता हूं कि क्‍या कभी ऐसा नहीं लगता कि किसी रचना को एक ऐसे मुकाम पर छोड़ देना चाहिए जो सवाल उठाए। जैसे इस कविता को ही अगर आप अंत से थोड़ा पहले यानी कल्‍पना और यर्थाथ की बात पर समाप्‍त कर देतीं, तो मेरे ख्‍याल से ज्‍यादा प्रभावी होती।

डा. महाराज सिंह परिहार said...

अनामिका जी

आपकी कविताये संवेदना का भरपूर है. अपनी अनुभूतियों को आपने प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया है. इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं.

डाक्टर महाराज सिंह परिहार

Anonymous said...

अनामिकाजीE आपकी कविता पर अनेक विद्वजनों ने अनेक पहलुओं को ध्यान में रखकर, अनेक महत्वपूर्ण और सारगर्भित बातें कही हैं। सबका अपना-अपना सोचने का तरीका है, किसी को भी किसी से भी सहमत या असहमत होने का अधिकार है।

मेरा मानना है कि व्यक्ति जिस समाज, धर्म या संस्कृति में पल-बढकर बढा होता है। व्यक्ति का जिस प्रकार से समाजीकरण होता है, उससे उसके मनोमस्तिष्क में और गहरे में जाकर अवचेतन मन में अनेक प्रकार की झूठ, सच, भ्रम या काल्पनिक बातें स्थापित हो जाती हैं, जिन्हें वह अपनी आस्था और विश्वास से जोड लेता है। जब किन्हीं पस्थितियों या घटनाओं या इस समाज के दुष्ट एवं स्वार्थी लोगों के कारण व्यक्ति की आस्थाएँ और विश्वास हिलने लगते हैं, तो उसे अपनी आस्था एवं विश्वासों के साथ-साथ स्वयं के होने या नहीं होने पर ही शंकाएँ होने लगती हैं। इन हालातों में उसके मनोमस्तिषक तथा हृदय के बीच अन्तर्द्वन्द्व चलने लगता है। फिर जो विचार मनोमस्तिषक तथा हृदय के बीच उत्पन्न होते हैं, खण्डित होते हैं और टूटते हैं, उन्हीं मनोभावों के अनुरूप ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व भी निर्मित या खण्डित होना शुरू हो जाता है।

स्त्री के मामले में स्थिति और भी अधिक दुःखद और विचारणीय है, क्योंकि पुरुष प्रधान समाज ने, स्वनिर्मित संस्कृति, नीति, धर्म आदि सभी के निर्वाह की सारी जिम्मेदारियाँ स्त्री पर थोप दी हैं। कालान्तर में स्त्री ने भी इसे ही अपनी नियति समझ का स्वीकार लिया। ऐसे में जबकि एक स्त्री को जन्म से हमने ऐसा अवचेतन प्रदान किया जहाँ स्त्री शोषित, दमित, निन्दित, हीन, नर्क का द्वार, पापिनी आदि नामों से कुचली गयी है, वहीं दूसरी ओर सारे नियम-कानून, दिखावटी सिद्धान्त और नकाबपोस लोगों के बयान कहते हैं, कि स्त्री आजाद है, पुरुष के समकक्ष है, उसे वो सब हक-हकूक प्राप्त हैं, जो किसी भी पुरुष को प्राप्त हैं और जैसे ही कोई कोमलहृदया इन भ्रम-भ्रान्तियों में पडकर अपना वजूद ढँूढने का प्रयास करती है, अन्दर तक टूट का बिखर जाती है। उसके अरमानों को कुचल दिया जाता है, ऐसे में जो अवस्था निर्मित होती है, उसे भी हमने दार्शनिक कहकर अलंकारित कर दिया है। जबकि जिस दशा को दार्शनिक कहा जाता है, असल में वह क्या होती है, इसे तो वही समझ सकता/सकती है, जो ऐसी स्थिति से मुकाबिल हो।

शुभकामनाओं सहित।

आपका
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है।
इस संगठन ने आज तक किसी गैर-सदस्य, सरकार या अन्य किसी से एक पैसा भी अनुदान ग्रहण नहीं किया है। इसमें वर्तमान में ४३६६ आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८) मो. ०९८२८५-०२६६६
E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

राज भाटिय़ा said...

वाह वाह जी बहुत ही सुंदर लजाबाव लगी आप की यह कविता. धन्यवाद

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

केवल कविता ही सुन्दर नहीं, उसमे निहित भावार्थ भी सुन्दर है ... हालाँकि मेरा अपना ख्याल है कि जीवन के कर्तव्यों से हटकर कोई निर्वाण हो नहीं सकता ...
ये मेरी अपनी मान्यता है ... ज़रूरी नहीं कोई इससे सहमत हो ... मई तो यह मानता हूँ कि एक अच्छा, सफल, सुन्दर, निरोग, और निर्दोष जीवन ही निर्वाण है

hem pandey said...

गीता ने सिखाया है - निर्लिप्त हो कर कर्म करो. गृहस्थ के लिए शायद यही निर्वाण है.लेकिन निर्लिप्त रह कर कर्म करें कैसे ? इसका उत्तर भी गीता में है - अभ्यास से यह संभव हो जाएगा.
एक बहुत सुन्दर रचना के लिए साधुवाद.

कुमार राधारमण said...

सुख की चाहत का अंत दुख से ही होता है। इसलिए ज्ञानियों ने सुख की नहीं,आनंद की बात की है।

sandhyagupta said...

Sahitya aur darshan ka adbhut mel.shubkamnayen.

HBMedia said...

तुम्हारा साथ पाने की
उद्विग्नता ...
हड्डियों के ढांचे से
चिपके मांस में
छिपी रक्त धमनियों को
उकसा देती है ...bahut sundar lekhan

गौरतलब पर आज की पोस्ट पढ़े ... "काम एक पेड़ की तरह होता है."है

ज्योति सिंह said...

चाहतें परछाइयाँ बन कर
पीछा नहीं छोडती...
मानो तिल की तरह
शरीर पर पड कर
याद दिलाती रहती हैं...
अपने अधूरेपन का.
bahut hi achchha likhti ho .main naraz nahi ,nagpur aur pune gayi rahi 11 dino ke liye ,kal aai hoon .kaam ki vazah se sabko waqt nahi de pati aur kya kahoon ?

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" said...

gahan saarthakta apne aapme saheje hue ek badi rachna!!!!!!!