शनिवार, 26 जुलाई 2025

घर अब घर नहीं लगता

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घर अब  घर नहीं लगता 
जब जब घर की चौखट  
पर पैर रखा 
किसी वीराने जंगल में 
पहुँच जाने का एहसास 
चुभ गया मन में ,

माँ  एक कोने में 
खाली खाली आँखों से 
पिता की तस्वीर को 
एक टक निहारती 
बैठी मिली 

पिता जी के जाने के बाद 
घर खाली सा लगता है  !

वही  दरो - दीवार है 
वही फर्नीचर 
वही दो पलंग 
घर के कोनों में जमे बैठे हैं 
पर फिर भी पूरा घर 
एक घने अँधेरे से भरी 
काल कोठरी सा 
वीरान सा लगता है  
जिसके हर कोने में 
खामोशियां रो रही हैं  !

माँ  का सपाट सा 
दिखने वाला चेहरा  भी मानो 
दुखों के तूफ़ान समेटे हो ,
सौ प्रश्न हों आँखों में 
विवशताएँ मानो होठों के भीतर 
हिलोरे मार मार कर 
घुट रही हों 
पर वो कुछ कह नहीं रही हैं  !

ये मंजर देख मन में 
बहुत कुछ तरक  जाता है 

नज़र  घर के चारों  तरफ 
पिता जी का अक्स ढूंढ  रही है 
कल्पनाएँ  अपने प्रयासों में 
कई बार सफल भी होती हैं 
पिता जी को किसी कोने में 
बैठा  सा देखकर ............ 
लेकिंग सत्य तो कुछ 
और ही है ना 
जो कड़वा है  !

मन की आँखे बरस रही हैं 
बाहें एक बार को तो 
अपने आप फ़ैल जाती हैं 
पिता जी से आलिंगन लेने को 
और फिर सिमट जाती हैं 
उदासियों का आकाश 
स्वयं में भर कर  !

अब घर घर नहीं लगता 
माँ बुलाती है तब भी 
मन नहीं करता वहां जाने का 
क्यूंकि बरबस ही 
जिद्दी आँखे छलक ही जाती हैं 
अब माँ को ही 
अपने पास बुला लेती हूँ 
कि पिता जी के जाने के बाद 
घर  अब  घर नहीं लगता !!












मंगलवार, 10 जून 2025

“माँ " आस पास महसूस होती हो

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जाने क्यों आजकल अक्सर
माँ मुझमें चहल - कदमी सी करती 
महसूस होती हो

ख्वाबों में ही सही
मंद मंद मुस्काती तुम
उलझनों में फँसी मुझे
दिलासा देती हुई सी
परेशानियों की झाड़ियों से
हाथ पकड़ खींचती हुई सी
माँ आजकल अक्सर
मुझमें ही चहल कदमी करती सी
महसूस होती हो !!

रात के ख्वाबों में विचरती
गुमसुम बैठी माँ तुम्हें ही
बुन रही होती हूँ
और लगता है
कि पलभर को तुम्हारा साया
मेरे पास आया और निकल गया

जाने क्यों आजकल अक्सर
माँ मेरे आस पास चहल कदमी सी
करती महसूस होती हो !!

बच्चे भी ठिठोली कर कहते हैं
‘माँ ’ आजकल आप
अपनी माँ जैसी लगती हो
नानी जैसी बातें करती हो ,
नानी जैसी हँसती हो ,

और माँ मैं तब तुम्हारी
होठों के कोरों तक फैली
मुस्कान वाली तस्वीर देखती हूँ
और अपना ही अक्स पाती हूँ

“माँ " आजकल न जाने क्यूँ
अक्सर तुम
मुझमें ही चहल कदमी करती
महसूस होती हो !!

मंगलवार, 20 मई 2025

स्त्री और स्वाभिमान
















स्त्री अपना स्वाभिमान रौंद देती है
उस घर की ख़ातिर
जिसे मकान से घर बनाते हुए
उसने हज़ारों बार सुना ….
“निकल जाओ मेरे घर से “

अपने बच्चों के किए
घर में शांति बनाये रखने के लिए
गिर जाती है कितनी ही बार
अपनी ही नज़रों में,

हाँ …. उन्हीं बच्चों के लिए
जिन्हें अपना सर्वस्व देकर भी
माँ के नाम से नहीं
पिता के नाम से ही जाना जाता है !

सहती रहती है उस कामुक इंसान को
जिसने अपनी ज़िद्दी इच्छाओं की
कामुक भावनाओं के नाखूनों से
उसके लाल मिट्टी वाली
दिल की धरा को छीला है !

मूक आँखों में उन किरचनों का
दर्द समेटे,
झंझावातों से सुन्न हो चुकी
धमनियों से
थक जाती है सोचते सोचते …
कि कैसे भेड़िया बन जाता है पुरुष
अपने लिसलिसे, बुलबुलाते
कीड़ों को शांत करने के लिए …

कैसे स्वांग करता है, मनुहार करता है
मानो आसमान कदमों में रख देगा !

नहीं जानना चाहता जो
साथी की मर्जी
अपनी जिद्द की धुन में
मसल देता है रूह को भी !

आह ! कैसी विडंबना है …
बार बार
बालात्कार होता है
होती रहती है रूह लहूलुहान
अधेड़ उम्र के पड़ाव पर भी बार बार
फिर भी तमाम उम्र
उस रिश्ते को ढोती
इस रिसते मवाद का इलाज़ भी
नहीं कर सकती !

साथी….. साथी कहना तो मानो
साथी शब्द को ही गाली देना है
उसीके बदलाव की उम्मीद में
ख़ुद का अस्तित्व भी चीख चीख कर
बग़ावत कर रहा होता है
सारे बंधन तोड़ देने को
किंतु नहीं पकड़ पाती
अपनी अलग राह
कि….
जवान बच्चों का भविष्य है
नए रिश्तों के आगमन का बंधन है
समाज -परिवार की शरम, बंधन
बेड़ियां बन जाते हैं उसके
कठोर फैसलों में
और …… और वो
सहती रहती है …
सहती रहती है …
और बस सहती ही जाती है
अपने स्वाभिमान को रौंदना,
अपनी ही नज़रों में गिर जाना
बिछा ही देना स्वयं को
सुन्न धमनियों के साथ
मृत हो चुके शरीर के साथ
उस कामुक, अंध लोलुप
इंसान के सम्मुख
जिसे संसार उसका
जीवन साथी कहता है !


शनिवार, 30 नवंबर 2024

संतान

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चेहरे पर झुर्रियाँ

हिलते हुए दाँत 

आँखों पर चश्मा 

सर पर गिने-चुनें 

सफेद बाल ,

ख़ुद की पहचान खोकर 

जो तुम्हें पहचान दी है 

आज तुम्ही उन्ही माँ-बाप से 

उनकी पहचान पूछते हो। .

किचन की गर्मी, पसीना 

हाथ पर गर्म तेल के 

छींटे, कटने के निशान,

माथे पे बाम लगाये,

पैरों में दर्द सहती 

हाथों में करछी, बेलन लिये 

आज भी वही कर रही है 

जो पिछले 25-30 सालों से 

करती आ रही है 

फिर भी पूछती है

बेटा कुछ चाहिये….  !!

तुम ही उसकी जमा पूंजी हो

और तुम उस से  

उसकी जमा पूंजी पूछते हो  !

ख़ुद को मिटा कर 

जिसने तुमे बनाया

तुम उन से उनकी 

औक़ात पूछते हो ???

दो पैसे कमा, 

अपने कर्तव्यों से विमुख 

माता पिता को उनके कर्तव्यों का 

ज्ञान देते हो …..

उनके सुख दुख से अनजान

जरूरतों को दरकिनार कर

घर के चौकीदार बना

स्वयं के आनंद में डूबे 

अपनी संगिनी की 

भावनाओं से आद्रित 

मान-मनुहार करते

अपने माता - पिता के मान को 

खंडित करते हो

कैसी संतान हो ???

शनिवार, 10 जून 2023

शब्दों का सफर

















मै नहीं लिखती अब 
क्यूंकि, लिखने के लिए 
शब्दों को जीना पड़ता ह है । 

शब्दों को जीने के लिए
मनोभावों में कहीं गहरे तक 
उतरना पड़ता है। 

गहरे उतरने की क्रिया में 
तन्हाई से अटूट बंधन बनाते हुए 
जख्मों को उघाड़ उघाड़ कर 
कुरेदना पड़ता है । 

चीत्कार करते हुए 
एहसासो की वेदनाओं को 
शब्दों के वस्त्रों से सजा 
दर्द के मंच पर 
उतारना पड़ता है ........
तब कहीं जाकर जज़्बात 
कविता का रूप लेते हैं 
और इन शब्दों से 
कविता बनने तक का सफर 
बहुत रुलाता है मुझे 
इसलिए मैं अब नहीं लिखती  । 

क्यूंकि नहीं है पसंद मुझे 
जिंदगी को रुदन की पहरन में देखना 

क्यूंकि चाहे झूठी हंसी हंस कर ही 
पा लेती हूँ मैं विजय 
कुछ हद तक 
अपने अंदर के फैले नैराश्य से ,

भटका लेती हूँ 
अपनी व्याकुलता को 
अपनी मस्त चाल से 

पी जाती हूँ कड़वाहट 
अपने भीतर की ..........
गीतों की गुनगुनाहट से । 

संवार लेती हूँ 
विषाद  में डूबे मन को 
औरों को गले लगा कर ,,,,,
मुस्कुरा लेती हूँ 
खुद भी 
दूसरों को हंसा कर । 

इसलिए नहीं लिखती अब
क्यूंकि लिखने के लिए 
शब्दों को जीना पड़ता है  ।। 


मंगलवार, 20 सितंबर 2016

ओ रे पाकिस्तान

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सोते शेरों को मारने वाले
पीठ में छुरा घोंपने वाले
अब तू भी चैन से न सो पायेगा
तेरे घर में ही घुस के तुझे मारा जायेगा !!

तेरे लिए तो हमारी सेना बहुत
तोपों की गर्जन तेरे बस की नहीं
कायरता तेरी  इसी में दिखे
कि शहीदों को अपनाने का
तुझमे दम  भी नहीं !!

सब्र दिखाया अब तक हमने बहुत

पडोसी धर्म अब तक निभाया बहुत
17 के बदले 70 न मारें तो देखना
तुझे घुटनों पे ना लाये तो देखना !!
तू  जिस जुबां में समझता है
उसी जुबां में अब बात होगी
ना दोस्ती ना कोई फ़रियाद होगी
नेस्तनाबूत  अब तेरा वज़ूद होगा
और तेरी रूह कब्र की मोहताज़ होगी.

एक चीनी के पीछे
जो दो-दो बेटे गँवाए
ऐसी दोस्ती का भिखारी है तू
आतंकी के  मदारी का खिलौना बना 
ऐसा गर्त में गिरता अनाड़ी  है तू  !!
मत भूल  रे ए बुड़बक वतन 
युद्ध हुआ तो पिछड़ेंगे दोनों वतन
तब बाकी दुनियां हमारी बाप होगी
यही सोच सदा सभ्य रहे हम
प्रगति पथ पर चले, शांत रहे हम
मगर ओ अक्ल के सौदागर
अब तेरी ना कोई चाल कामयाब होगी !!

 

गुरुवार, 7 जनवरी 2016

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Sunita Khurana 
 
 

सोमवार, 29 जून 2015

माँ

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 छोटे थे तो
माँ के आँचल में
सिमटे रहते थे हम

ऑफिस जाती थी तो
पल पल घडी के कांटो को
निहारा करते थे हम
आके सीने से लगा लोगी माँ
उसी पल की चाहत में
उदास होते थे हम.

जवानी मस्तानी आई
हम मद मस्त होने लगे
आजादी की चाह लिए
दोस्तों में वक्त देने लगे.
हम बदल गए,
माँ बदली नहीं,
ऑफिस से लौट 
इंतज़ार करती रही 
पूछना, टोकना भी
कहाँ  भाता था माँ .
बेरुखी से कहना
क्यों बार बार पूछती हो माँ,
सोचते थे कि रात आये नहीं
दोस्तों से बिछड़ कर न जाएँ कहीं
ये आजादी यूँ ही चलती रहे
पापा घर बुलाने की जिद न करें।
आज माँ तुमसे दूर हूँ
नौकरशाही में माँ मजबूर हूँ ,
आज न तुम्हारी रोक टोक है
दिन रात दोस्त ही दोस्त हैं
आजादी भी माँ भरपूर है
घर भी है माँ
साजो-सामान भी है
पर माँ तू नहीं है
न तेरी आवाज़ है
इंतज़ार करती
वो तेरी न आँख है.

आज कोई कहने वाला नहीं
बेटा, तू कब आएगा,
कोई  पूछता नहीं  कि
बेटा, तू क्या खायेगा।
मैं भूखा रहूँ या
बीमार रहूँ
माथा चूम ले
गोद में भर के मुझे
मेरा दुख छीन ले
दूर तक भी कहीं
माँ वो तेरा साया नहीं .
आज तडफता हूँ
माँ तेरे साथ को
आज रोता हूँ
माँ मैं तेरे प्यार को
चंद पैसों की खातिर
माँ तुझसे दूर हूँ
आजादी है महंगी
माँ बहुत मजबूर हूँ !!
 

शनिवार, 14 मार्च 2015

आखिर तो इंसान हूँ ....

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दिल में चुभन हुई
तो मैं हंसने लगा
मानो  हंस के
चुभन को भुलाने चला ..

चुभन जख्म करने लगी
तो मैं खामोशी से
लब  सी गया
क्यूंकि आंसू दिखाने से
डरता रहा ..

रक्त रंजित किया ..
जख्मों ने छलनी किया
अश्क रुक न सके
आँख छलक ही गयी 

आखिर तो हाड-मांस का
पुतला हूँ मैं.
भावों के स्पंदन से
जलता बुझता हूँ मैं  !!

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2015

एकाकीपन.......

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एकाकीपन के 
झंझावतों से 
स्वयं को मुक्त करने,
अंतस की खलिश 
को कम करने हेतु 
बड़ी बहिन समान
भाभी, माँ सी छाया
देने वाली सासु माँ
मन को अलोलित करने वाले
मासूम बच्चो से ,
और उन बाकी रिश्तों …
जो इस तिश्नगी पर
फोहे बनने को काफी थे ……
उस सब से मिल तो ली थी
मगर उफ्फ ये
दिल की आग से
तपा आँखों का पानी,
कुछ अनचाही तल्खियाँ,
और जिद्दी मनहूसियत
मेरे वजूद को काबिज किये रहे
और ये रूह जो
सिर्फ और सिर्फ
तेरे आगोश की, तेरे साथ की,
तेरे जज्बातों की, स्पर्श की
तपिश पाने के लिए
तड़फती ही  रही .....!!



शनिवार, 24 जनवरी 2015

ए दोस्त ........





मेरे वक्तव्य को 
अन्यथा न लेना दोस्त 
मेरी फितरत है 
जिसके लिए जैसा भाव है 
उसे उसका सौंप दूँ  
बिना लाग -लपेट के
कह देना मेरी आदत है। 


नहीं, दोषारोपित नहीं कर रही 
यह कह कर तुम्हे कि 
अधूरापन है दोस्त 
तुम्हारी मित्रता में।  

समय की, समाज की 
असह्य बेड़ियां हैं 
हमारे लिए दोस्त 
इसलिए विचलित मन 
बार बार तुमसे ही 
उलझ जाता है  !

बहुत कुछ बांटना चाहती हूँ 
तुम्हारे साथ ,
परन्तु हमारी  व्यस्तताये  
इस मैत्री को 
अल्पायु किये देने पर 
आमादा हैं !

अस्त -व्यस्त होते हुए 
मेरे यही मनोभाव 
व्याकुल किये रखते हैं मुझे  
और मैं स्वयं को 
हर संभव प्रयास करते हुए भी 
असमर्थ महसूस करती हूँ !!




शनिवार, 13 सितंबर 2014

ये कैसी परिणति




नाज़ों से पाला 
दर्दों को झेला
देह को कटते
खुली आँखों से देखा
तब तुझे पाया था !

खून से लथपथ
अचेत, अधमरी सी
निर्बल सी काया को
अपने आगोश में
समेटा था
तब तेरी साँसों को
सम्बल मिल पाया था !

अपने पयोधरों से
तेरा रोम रोम सींचते
रातें आखों में काटते
तेरे लिए दुआएं मांगते
तेरे काँटों को चुनते 
तेरी इस माँ ने
तेरी ही खुशियों के लिए
रब की हर चौखट को
टेरा था !

लेकिन तूने
नव-यौवना बनते ही
घात-प्रतिघात कर
विश्वास की ड्योढ़ी को
तिरस्कृत कर
ममत्व का
निर्ममता से
प्रतिदान करते हुए
तनिक भी विचारा नहीं 

और 

अनजान युवान की मलिन,
लिस-लिसी, अशुचि पूर्ण
मिथ्या बातों में आ
देह की श्वेत चुनर को 
तार तार कर,जश्न मना
स्वयं तो उच्छिष्ट (अपवित्र) कर
अपनी ही धरती को
बंजर बना डाला !

आह ! ममता को सुवासित करने
की ये कैसी परिणति
कि  तेरी जननी
अपने ही अनुताप में
सुलगती, आज स्वयं के
अग्निस्नान को बाध्य है !!



शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

चाँद पिघल रहा है

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चाँद की तासीर 
ठंडक लिए होती है 
तो क्यों आज 
पिघल रहे हो 
चाँद तुम … ?

जानती हूँ 
इस पिघलन में 
कितनी व्याकुलता है 
कितनी अपने ही टुकड़ो में 
टूटने की विवशता है     

कितनी वेदना को 
आत्मसात किया  होगा 
चाँद तुमने 
तब कहीं जा कर 
पिघलने पर 
मजबूर हुए होंगे. 

देखती हूँ 
तुमसे ही अवभासित  
तुम्हारी आँखों के तारे 
तुम्हारे ये तारे 
इतरा रहे हैं  
अपने रूप पर 

तुमसे अस्तित्व पाकर 
तुम में ही दाग दिखाते हैं  
तुम पर प्रहार कर  
तुमसे अपृक्त (विलग ) हो 
तुम्हे ही नगन्य बताते हैं  !!

आज के युग के ये तारे 
पूर्वाग्रहों में डूबे 
छद्य समाज से परिष्कृत 
कठुराघात करते 
टमकाते, मटकाते  
ओ चाँद, 
तुझे ही 
खंड खंड करते 
तेरी शीतलता को 
उच्छिन्न कर तुझे 

गर्माते ही जाते हैं !!



शनिवार, 12 जुलाई 2014

वक्ते - नाजुक के दौर में है चमन ....














गिले -शिकवे करने आते बहुत 
कर्मठ बनना किसी को गवारा नहीं 
सुधार हो देश का, सबकी मंशा यही 
व्यवस्था सुधारें किसी में ये दम तो नहीं 

स्वार्थ सिद्दी को जेबें गरम करते बहुत 
बाबू बन जेब से हाथ बाहर आते नहीं 
पंच दिवसीय दफ्तर जाना भला सा लगे 
हाय ! ओफ़िस कार्यकाल बढे न कहीं !!

दूसरों  पर  ऊँगली उठाना आसान 
अपना गिरेबान तो कोई झांके सही 
रोना भ्रष्टाचार का दिन रात रोते रहें 
नैतिकता पे चल कोई उद्योग करते नही  !!

ललचौहो की सत्ता के  गुण है बड़े 
दादागिरी से श्वेत सब काला करें 
नंग नेता, अधिकारी से कोई लड़ता नहीं  
असहाय जनता नारे बाजी करती नहीं !!

हाय हाय का रुदन मत करो  
धीर धर, इस घडी को संयम रखो  
बेसब्री की सुरा में न मतवाले बनो 
नयी नीतियां गतिशील होने तो दो !!

वक्ते - नाजुक के दौर में है चमन 
साथी मुल्कों से उठती हैं लपटें बड़ी 
खरे,श्रमि  नेता भी कम है बहुत 
इनको भी आजमाइश करने तो दो !!

शुक्रवार, 20 जून 2014

ओ वसुषेण (कर्ण )


बहुत दिनों से महाभारत टी. वी. पर दिखाई जा रही है।  आज तक जितना कर्ण को जाना था, श्रद्धा में नत-मस्तक हुई थी, लेकिन उस दिन जब द्रुपद कन्या का चीर - हरण दिखाते हैं तो कुछ संवाद कर्ण ने जो द्रौपदी के लिए कहे, असहनीय थे।  तब से अंतस में कर्ण के प्रति कुपित मन भावों को  शब्दों में ढालने को कुलबुला रहा था ,  आदरणीय प्रतिभा सक्सेना जी के बार बार प्रेरित करने पर आज मैं यह लिख पायी हूँ जो आपके लिए प्रस्तुत है  … 

ओ वसुषेण (कर्ण )

क्यूँ सदा जन्म ओ पालन की हीनता में रहे 
क्या न विश्वास था खुद के शौर्य पर 
धर्म का ढोल पीट सदा अधर्मियों के साथी बने 
क्या यही था पौरुष कि हीनता शमित न कर सके !!

पौरुष प्रखर होता जो लाज कृष्णा की बचाते 
उल्टे स्वयं ही कटु स्वर प्रताड़ना के उच्च किये 
वेश्या, कुलच्छिनी, कृष्ण की भार्या सी 
न जाने क्या क्या कह विष उड़ेलते गये !!

टेरती हारी थी जब वो कुलीना,
तब साथ तुमने मित्रता की ओट में कौरवों का दिया 
पाषाण हृदय लिए कहो कैसे उस माँ का सामना किया 
पूरा जीवन जिस बेल को सींचा किया, लज्जित किया !!

हे अभागे वसुषेण क्यों तुम इतने पूर्वाग्रहों में घिरे 
लजा दिया पौरुष भी अपना, गरिमा को कलंकित किया 
संतप्त मन, विषमताओं में जीते रहे सदा 
मित्र धर्म की आड़ में क्या पद लोलुप रहे ?

मान पाकर भी अमान्य हो गए 
कवच कुण्डल देकर भी रीते हो गए 
विभ्रमताओं के कंटक में चिर व्याकुल रहे 
जान कर भी अधर्म में जो गिरे, उसे क्या कहें !!


बुधवार, 4 जून 2014

दूर्वा..

आज दुर्वा को नींद नही आ रही है...रात का तीसरा पहर भी ख़तम हो चला है...नींद न जाने आज कितनी कोसो दूर चली गई है ..बीते हुई सुबह के एक बजे से रात के नौ बजे तक के सारे पल चल-चित्र की भाँती उसके हृदय-पटल पर आ-जा रहे है ॥!!

दो दिन से दुर्वा को बुखार  है..लेकिन स्त्री और धरती के लिए इस सृष्टि में आराम कहाँ??? हर पल कर्म किए जा...और फल की इच्छा रखना तो दूर..बस सहे जा, सहे जा..जो जैसा फल दे..यही विडंबना है और यही समानता है स्त्री और धरती में ....,

आज सुबह दुर्वा के बेटे का रिजल्ट निकलना था..उसके पतिदेव ने इसी लिए आज छुट्टी ली थी ..फिर भी उसे  ऑफिस से छुट्टी लेनी पड़ी थी क्यों कि  ऐसा तो हो ही सकता कि  कोई काम अकेले ही कर लिए जाए..सुबह की आपा-धापी,  के बाद स्कूल पहुचे, क्युकी उसके बाद दुर्वा को आधे दिन के लिए ऑफिस भी जाना था..भगवान् का शुक्र है कि बेटा पास हो गया था.., जल्दी जल्दी में बुक्स लेने गए तो कही रास्ते में दुर्वा का चश्मा गिर गया..परेशान हो गई दुर्वा कि क्या करे ऑफिस में काम कैसे करेगी? ..पति देव भी शुरू हो गए अपने व्यंगय बाणों से बींधने (न जाने इन पतियों को देव की उपाधि क्यों और कब दे दी गई) छोटी सी बात का बतंगड़ बन चुका था.. गलती हो गई कि चश्मा गिर गया..लेकिन कोई जान-बुझ कर तो नही करता...आख़िर .गुस्से में पैर पटकती दुर्वा भी ऑफिस आ चुकी थी..शाम का वक्त भी आ गया..जैसी कि  उम्मीद थी दुबारा चश्मा मुद्दा बन गया..और रोते-पीटते रात भी आ गई...काम खत्म करते करते थक चुकी थीदुर्वा।

परन्तु पुरूष कितना खुदगर्ज़ होता है ...उसे सिर्फ़ अपना स्वार्थ, अपनी इच्छाए पुरी करनी होती है.. आज की दौड़ - भाग से थकी दुर्वा सारे दिन बातें सुन सुन कर मन भी उदास था ..ऑफिस में भी ठीक से काम न कर पाने के कारण डांट पड़ी थी पर इन सब बातों का उसके पति को क्या लेना - देना? पतिदेव की शारीरिक भूख शांत कराने के लिए भोजन के रूप में परोसो ख़ुद को...ये रात भी उसी रात में से एक थी..कुंठित मन, असहाए बदन, निढाल सी वो कर्त्तव्य पुरा कर रही है..पत्नी धरम निभा रही है.....दुर्वा अपने आप को समेटने का भरसक प्रयास कर रही है...ऐसा लगता है जैसे एक बार फ़िर उसके मन रूपी कांच की किर्चने टूट -टूट कर पूरे कमरे में बिखर गई हो....अश्रु भरी आँखों से, लहुलुहान दिल से और असीम वेदना से भरी जज़्बात रुपी उंगलियो से वो ख़ुद को सहेजने के लिए,,,समेटने के लिए तमाम रात प्रयास-रत रही...और रात के चौथे पहर की  पौ भी फ़ुट गई..फ़िर वही रोज़-मर्रा कि दौड़-भाग वाली जिंदगी की शुरुआत...आह दुर्वा सोच रही है..किसने रख दिया उसका नाम दुर्वा..कभी पढ़ा था उसने दुर्वा एक घास होती है..जो हर पल पैरो से रौंदी जाती है..और उसकी आह सुनने वाला, उसके दुःख को जानने वाला कोई नही होता... आह ...दुर्वा.... पराधीन सपने हूँ ...सुख नाही..वाली कहावत चरितार्थ करती हुई...!!