मंगलवार, 1 मई 2012

वो लफ्ज़ दोहरा दो....









बीते हुए लम्हों को 
इक बार लौटा दो,
फिर से पूरी रात
वो लफ्ज़ दोहरा दो..
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!


दिल की बातों को 
पढ़ लेना और...
'जान'  कह...
ढेरों प्यार कर कहना...
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!


वो  तुम्हारा 
हिज्र की रातों में

फूट कर रोना और कहना..

कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!



गुजरी रातों पे आज 
नए वादों की ख्वाहिश है ..
बस एक बार फिर से कह दो...
कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!




अगर हम हसरतों की 

कब्र में दफ़न हो जाएँ...

तो यह कब्रों पर लिखवा देना..

कि मुझसे बहुत प्यार करते हो..!!



बुधवार, 25 अप्रैल 2012

हे मेघदेव



हे मेघदेव विचरण करते हो
नभ में आवारा मद-मस्त हो 
उष्णता में भर लेते हो 
जल, सिन्धु देव का अतृप्त हो.
त्राहि त्राहि करता हर प्राणी 
देखा करता है व्यथित हो .

भारी बेडोल सी काया ले, फिर 
उमड़-घुमड़ गरजा करते हो 
कभी बाढ़ रूप धर कुपित हो
जल-जल करते हो धरती को.

उस किसान की जरा सोच करो
हर दिन-रैन में जो ये आस भरे 
कब फसल कटे,कब मेहनत रंग चढ़े..
कब दो जून की रोटी मिले.

ज्यूँ मेह गिरे कटी फसल पे 
आस भी ढार-ढार बहे,
खून पसीना सब बर्बाद हुए  
घर की दहलीज़ वीरान रहे.

उस झोपड़ पर भी दृष्टि करो
हालत उस गरीब की मनन करो 
त्रिपाल ढके जिसके सर को 
खोये जो जान,जल निकसन को.

धरा सोने को बची नहीं..
मजदूरी भी जिसको मिली नहीं,
सूखी लकड़ी का भी जुगाड़ नहीं..
दो रोटी जो पेट दुलारे कहीं.

सोने का आसन गीला है,
ढकने का वस्त्र भी गीला है,
तन की पैरहन गीली है,
बच्चों का मन भी गीला-गीला है.

जन-जीवन अस्थिरता में डूब गया 
हर जीव अती से कराह रहा.
तुम अब भी मद-मस्त चापें भरते हो.
इस सृष्टि पर तांडव करते हो.

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

ख़ुशी का त्यौहार -बैसाखी

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13 अप्रेल को हम ख़ुशी के त्यौहार के रूप में मनाते हैं. इस दिन को लेकर हमारे देश में बहुत सी किवंद्तियाँ हैं. वैशाख सक्रांति होने के कारण धर्मग्रंथों के अनुसार, इस दिन स्नान दान का महत्त्व तो है ही, सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के कारण इसे सौर वर्ष की शुरुआत भी मना जाता है.   हमारा देश कृषि प्रधान देश है  इसलिए 13 अप्रेल का यह दिन बैसाखी के पर्व के रूप में फसल पकने की ख़ुशी में उल्लास से मनाया जाता है . पंजाब में ढोल की थाप और भंगडे-गिद्दे के रंग इस दौरान दिलों को इन्द्रधनुषी उमंग से भर देते हैं.

Baisakhi

13 अप्रेल 1875 में इसी दिन स्वामी दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना की थी.  बौद्ध धर्म के कुछ अनुयायी ये भी मानते हैं कि महात्मा बुद्ध को इसी दिन ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. अतः यह दिन कई प्रकार से विशेष महत्त्व रखता है.

 खुशहाली और समृद्धि के इस पर्व के साथ ही त्याग और बलिदान का महत्त्व भी जुड़ा है .  इसी दिन गुरु गोविन्द सिंह ने त्याग की परीक्षा लेकर  खालसा की नींव रखी थी.

13 अप्रेल 1699 को गुरु गोविन्द राय जी ने आनंदपुर साहिब के श्रीकेसगढ़ साहिब में खालसा की स्थापना की. खालसा का अर्थ है 'खालिस' (शुद्ध) . इस पथ के माध्यम से गुरूजी ने जाति-पाति से ऊपर उठकर समानता, एकता, राष्ट्रीयता एवं त्याग का उपदेश दिया था.


बैसाखी के दिन गुरुवाणी के पाठ के दौरान गुरु साहिब जी ने सिक्खों से कहा कि मुझे धर्म और मानवता की रक्षा के लिए पांच शीश चाहिए. श्रीसाहिब (कृपाण) लहराते हुए गुरूजी ने पूछा - कौन मुझे अपना सिर भेंट करने के लिए तैयार है ? लोग घबरा गए. लाहौर का दयाराम साहस करके उठा और बोला - धर्म और मानवता की रक्षा के लिए मेरा तुच्छ शीश अर्पित है, स्वीकार करें. गुरूजी उसे एक तम्बू में ले गए. जब गुरूजी तम्बू से बाहर आये, तो उनकी श्रीसाहिब से लहू टपक रहा था. इस तरह क्रम से दिल्ली के धरम दास, द्वारिका के मोहकम चंद, जगन्नाथ पुरी के  हिम्मत राय और बिदर के साहिब चंद ने शीश देने को हाँ कही. कुछ समय बाद वे पाँचों सुंदर पोशाक पहने तम्बू में से बाहर आये. गुरूजी ने इन पांचों को  'पंज प्यारे' नाम दिया और अमृत छका (चखा) कर सिख के रूप में सजा दिया. उसी समय गुरूजी ने सिंहों के लिए पञ्च ककार (केश, कंघा, कड़ा, कच्छ एवं कृपाण ) धारण करने का विधान बनाया.

इसके बाद पंज प्यारों से अमृत छककर गोविन्द राय गुरु गोविन्द सिंह बन गए. उस दिन हजारों प्राणियों ने अमृतपान कर शोषित मानवता की रक्षा के लिए अकाल पुरुष की फौज बायी. गुरूजी ने 'खालसा' का सृजन कर शक्तिशाली सेना तैयार की. 'चिड़ियन ते मैं बाज तुडाऊँ - सवा लाख से एक लडाऊं'  का उद्घोष करके गुरूजी ने जनता की शक्ति को जगा दिया. उन्होंने 'इनहिंते  राजे उपजाऊं'  कहकर शक्तिहीन जनता को राजनीतिक शक्ति हासिल करने लायक भी बनाया.
Baisakhi


(साभार जागरण )

रविवार, 8 अप्रैल 2012

मैं अकेला भला था ....


दोस्तों दर्द-ए-दिल का पैमाना जब छलकता है तो जज्बातों की बरात कुछ यूँ शोर करती है...
ज़रा गौर फरमाइयेगा ....

प्यार के बदले में खरीदा उसने
और मुझे हासिल समझ लिया..

पलकों पे चले आये है अश्क मुसाफिर बन कर..
कि मेरे दिल  को उसने मेरा बदन  समझ लिया...!!



अब एक नज़्म...

मुझे यूं उदास रहने की आदत न थी
खुदा ये  मुहोब्बत के गम क्यूँ दे दिए..
मैं  अकेला भला था  इस  संसार  में
तूने  तन्हाइयों  के सागर क्यूँ दे दिए...

मैं   तो   हँसता  था  फाके  मस्ती   में   भी..
बे-रब्त  उम्मीदों  के  सैलाब  क्यूं  दे  दिए..
आरज़ू  ना  की  जिसने शब्-ए-महताब की,
 उसे खुद पे रोने के  सिलसिले  क्यूं दे दिए..

ज़ुफ्त्जू  ना  थी,  फिर   भी  वो  आ  ही  गया तो
उसके आने ने  जिन्दगी को शिकन  क्यूं दे दिए..

मेरी   आँखों   में  खुशियों  के  मेले  ना  सही..
उसे   अपना  बना  मुझे ये  आंसू क्यूं दे दिए...!!



मंगलवार, 27 मार्च 2012

जयपुर की सैर और एक सवाल


                         हवा महल 
साथियो  गद्य में मैं पारंगत नहीं हूँ इसलिए बहुत से विचार आवा-गमन कर रहे हैं और  बात को   सीधे सीधे प्रवाह में  कहने में रुकावट डाल रहे हैं. फिर भी क्या करूँ...विषय ही ऐसा है जिसे आप सबसे साँझा किये बिना नहीं रहा जा रहा. आखिर  अंतरजाल की हमारी ये दुनिया है ही इतनी मन-मोहिनी सी कि इस से  अपने मन की बात छिपाना कुछ बेमानी सा लगता है. अभी पिछले सप्ताह जयपुर जाना हुआ, हमारा जयपुर जाना ये पहली बार था तो जाहिर सी बात है कि यहाँ का आकर्षण, यहाँ की बाते , यहाँ की सरकार की पर्यटकों के लिए सुविधाएं जानने का पहली बार मौका मिला. मैं अपने घूमने के ढोल नहीं पीट रही हूँ....लेकिन यहाँ की एक बात जो खटकी वो मुख्य विषय है आप के साथ शेयर करने का.

हमने जयपुर में हवा महल, यंत्र-मंतर, आमेर का किला, नहार गढ़ का किला,जय वाड़ की तोप, चौकी ढाणी इत्यादि की सैर की. जयपुर की सड़कें काफी चौड़ी-चौड़ी हैं. ट्रेफ्फिक रूल्स का अच्छे से पालन किया जाता है.  सब जगह दो-पहिया पर पीछे वाली सवारी को भी हेलमेट पहनना  जरूरी है , लेकिन  हमारे यहाँ तो सब कानून को जेब में ले कर घुमते हैं, और ओवर लोडेड हो कर चलना यहाँ का फैशन है, जबकि जयपुर में इन नियमों का कडाई से पालन किया जाता है. बस एक फ्लाई-ओवर और मेट्रो रेल को छोड़ दें तो जयपुर दिल्ली से भी ज्यादा खूबसूरत और खुला-खुला नज़र आता है. वैसे ये मेरा स्वयं का नजरिया है. 
                                                                      आमेर का किला 

हाँ जहाँ-जहाँ घूमने गए सब जगह टिकट लेना पड़ा. समझ सकती हूँ कि इतने पुराने किलों का रख रखाव करना सरकार के लिए बहुत खर्चीला विषय है और उसके लिए टिकट लेना इतना बुरा भी नहीं लगता क्युकी साफ़ सफाई का भी वहां पूरा ध्यान रखा जाता है. लेकिन सबसे अधिक खटकने वाली बात चौकी ढाणी की टिकट की लगी. चौकी ढाणी में राजस्थान की संस्कृति, वहां के पुराने ज़माने में प्रयोग में लाये गए  औजार, बर्तन, रहन-सहन, खान-पान  के बारे में दिखाया गया है. यहाँ  हमें 400 रुपये प्रति व्यक्ति टिकट लेकर  जाना पड़ा. आज हम टेलिविज़न में विज्ञापन देखते हैं जिसमे  हर राज्य अपने राज्य की संस्कृति दिखाने, बताने, घूमने के लिए प्रेरित करते हैं. तो क्या अपने राज्य की संकृति दिखाने के लिए किसी प्रकार की टिकट का प्रावधान होना क्या उचित है ? कहाँ तो हम देश की जनता को लुभावने पैकेज देकर  देश के हर कोने की संस्कृति को जानने को  प्रेरित करते हैं , बात करते हैं एकीकरण की, और कहाँ फिर ये कर प्रावधान है ? हर राज्य को चाहिए कि वो अपने कोष से ऐसा बंदोबस्त करे कि वहां आने वाले पर्यटकों को कम से कम अपनी संस्कृति को जानने के लिए मुफ्त सुविधा उपलब्ध कराएँ.
                                                                                                    








                          चौकी ढाणी
दूसरी बात जयपुर में ये देखने को मिली कि भारतीय पर्यटकों के लिए यदि टिकट  20 रूपए है तो विदेशी पर्यटक के लिए वही टिकट 50 रूपए है. मैं समझ सकती हूँ कि मुद्रा परिवर्तन कर कुछ  लगते होंगे लेकिन फिर हमारा 'अतिथि देवो भव'  वाला भाव कहाँ अर्थपूर्ण रह जाता है ?

मैं महाराष्ट्र , गोवा  के अलावा और अन्य राज्यों में नहीं घूमी हूँ. गोवा में पुराना गोवा देखने के बहुत ही कमतर 10-20 रूपए की  टिकट है.  इसलिए नहीं जानती कि अन्य राज्यों में भी क्या अपनी संस्कृति दिखाने के लिए इतनी ज्यादा टिकट है. लेकिन अगर ऐसा है तो बहुत दुख की बात है. हर राज्य को  अपनी पुरानी संस्कृति से अवगत कराने  की सुविधा को तो कम से कम कर-मुक्त करना चाहिए.    साथियो आपकी क्या राय है ?

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

मौन डस जाता है रिश्तों को ....





विस्फारित नेत्रों से मन 
टुकुर टुकुर 
देख रहा है ...
पाँव पसारते 
सूनेपन को 
कि.....कैसे 
प्यार के 
अटूट बंधन में  
बंधे रिश्ते भी 
उदासीन हो गए हैं.

आज  कोई चाहत के भाव 
उत्तेजित ही नहीं होते,
एक तरफ 
हलचल हो भी तो क्या ...?
दूसरी तरफ तो 
फैली निस्तब्धता है.

संवाद, विवाद 
सब धाराशायी हो गए हैं.
शिकायतों का चलन भी 
श्वास-हीन हो चला है.

अंत में फिर वही मौन 
डस जाता है रिश्तों को 
यही अंतिम पड़ाव है 
तो क्यों बनाये....संवारे
जाते हैं रिश्ते ?

बेघर कर बादल
सोचता ही नहीं
उस बूँद का हश्र ,
धरा से लिपटे...रोते...
पीले पत्तों की व्यथा 
जानना चाहता ही नहीं
विशाल वृक्ष .

रिश्तों के सारे बंधन 
नकार ही दिए जाते हैं
तो फिर.........
घृणा का भी रिश्ता 
कहाँ रह जाता है !

और.....तब.....

मौन को ही 
अंगीकार करना पड़ता है
अंततः .... 

तो ....

फिर रिश्तों में 
डूबना क्यों....?
मोह - माया में 
फंसना क्यों....?
निर्मोही ही भला 
फिर श्याम सा !
कठोर ही अच्छा 
फिर राम सा !!


बुधवार, 18 जनवरी 2012

माध्यम बनी क्या आज नारी ....?



कुटिल            नीतिज्ञों                के  
हृदय            कितने       मलिन    हैं 
स्वयं        हैं           षड्यंत्र       रचते 
फांसते        निरी         नार          हैं.

शोणित        बहाते     अपनों        के  
आश्वस्त        करते         राज       हैं,
मरवा      निर्दोष       रणभूमि      में 
समझते   बच   गयी   अब   लाज  है.

प्रेम        हृदयों       को          तोड़ते
शायद        पत्थरों        के        बने 
इर्ष्या   की    अनल     में     दहकता 
जिनका       निज        स्वार्थ       है.

प्रतिशोध    लेने     के   लिए    सदा 
उपभोग        करते       नारी      का
सहिष्णुता      कैसे      बसे      जहाँ 
विष-वासना     करती      राज     है.

वासना       में         अंध        रावण 
शक्तिरूपा     से       शक्ति     तोलता   
हुंकार      भर        अभिमान       से 
अपने     अंत      को      ललकारता.

अपहरण     कर     मिथिलेश     का 
निर्लज्ज,    रण-भेरी     में    नाचता  
अग्नि  परीक्षा  ले कर भी  सिया को  
अधिकार  हीना  वन  में  भेजा  गया.

याज्ञसैनी     भी     बच     ना     पाई 
विभाजित  हो  पुरुषों  के  वर्चस्व  से 
केशों  से  घसीटे, कोई  वस्त्र  खींचता  
बाहों में लिपटी देह,विद्रूप है टटोलता.

भगिनी   का   बदला   लेने   कुरों  से 
मामा    पासों     का    खेल    खेलता .
कुरुक्षेत्र   पर   महाभारत  लिख  कर 
इतिहास     द्रौपदी     पर     बिसूरता.

सब   सहे   ये    नारी,  फिर  भी  कहें
नारी       नरक       का       द्वार     है
माध्यम     बनी    क्या   आज   नारी 
सामर्थ्य     दिखाने       के      लिए ?

शुक्रवार, 6 जनवरी 2012

तुम मुझसे घृणा करो...




मेरी तो तुम से लगन है
मेरी अराधना हो तुम
मैं अपनी अविराम प्रीति पर 
स्वयं से घायल,
स्वयं से भूली
चली जा रही हूँ.
मेरी तो चाहत है
कि मैं अपनी 
आशा की समाधी पर 
कामनाओं की
फुलवारी लगा लूँ .
लेकिन मैं तुम्हारे
भविष्य के पथ का 
शूल नहीं हूँ.
मैं जानती हूँ कि..
मुझसे छुटकारा पाने के 
प्रयत्नों में 
स्वयं को तुम
बेबस पाते हो.
हमारे मिलन की
स्मृतियाँ कहीं 
तुम्हारे चित्रों के
रंग बिगाड़ जाती हैं.
लेकिन इसमें 
मेरा अपराध क्या है ?
भविष्य की सुखद 
कल्पनाओं में बौराए 
तुम चाहो तो 
विगत संस्मरणों को 
विस्मृति में डुबो सकते हो.
तुम मुझसे घृणा करो
ऐतराज़ नहीं मुझे,
लेकिन तुम्हारे 
ह्रदय के दाह की
ज्वाला नहीं चाहिए मुझे.
मुझे इसी अटूट 
अनंत विश्वास के 
साथ जीने दो
कि तुम्हारे 
विगत संस्मरणों 
के कफ़न में 
मेरे अरमान भी 
लिपटे रहें.



शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते"




समझे   न   कोई  अपना,   सब   दीन   नज़र  से  देखें 
हों   क्षमताएं   असीम  चाहे   पर  दोष  अकूत  आरोपें.
शमित किया जिसने भी अपनाया ,कटु स्वरों से गोंदा
सर्वस्व   दिया   अपना ,   पर    अंत   एकाकी    पाया.

अभिमानी,  पौरुष  प्रखर  दिखाता,  सदा  रौंदता आया,
हतभागी  के  भाग्य  को  हाय  पौरुष  ही  डसता  आया.
टकरा  पाती काश !  क्रूर  काल  से   करती  अपनी हेठी,
अंतस की दहकी ज्वाला से इस पुरुष  को भी दहका पाती.

भिखरी   टूटी    हर   काल  में,   बटी   सदा   रिश्तों   में,
फिर  भी  सदा  रही  पराई,  चिर  व्याकुल  रही  सदा मैं,
क्षुब्ध  ह्रदय  पगलाया,  आज आवेशित  हो  गयी काया,
परिहास  करूँ या लूँ प्रतिशोध, बस  मन  यूँ ही भरमाया.

अपमानित  करते आये  क्रूर  ये  मनोरंजन  हमें  बनायें,
संवेदना  कहीं  बची  नहीं, ये  क्या  न्याय नीति अपनाएँ.
आदर्श   नहीं  हैं   इनकी  राहें,  सदा  अवसर  को  तकते,
क्षण  में  चटका   रीती-नीति  को,  कौमार्य  को  ये  हरते.

गुण-गरिमा,    मर्दन,    सब    इनके     लिए    आरक्षित
स्वाभिमान,   गौरव-गरिमा    से    हमें   रखें   ये  वंचित.
पग-पग     पर    घात    लगाये ,   शत्रु     बन    के    बैठे 
न कोई  'अरि' हो जिसका,  नारी को यूँ परिभाषित करते.

अब   प्रतिमान  बदलने  होंगे, दांव  हमें  भी  लड़ने  होंगे,
कुलीन  नपुसकों के  छल-बल अब निष्फल  करने  होंगे.
कुशल   नीति    के   बाण   भेद,  पर्याय    बदलने    होंगे,
शोभा,मान, सुयश पाने को, विषम प्रयास तो करने होंगे.




बुधवार, 21 दिसंबर 2011

आह ! वो बचपन

















वो गालों पे 
उँगलियों के निशान..
वो मार खा कर
सूजे-सूजे होंठ,
कंप-कपाता मन,
डर के मारे...
अश्रुओं से 
भीगा वो चेहरा
मुझे भूलता ही नहीं है. 

रूह की अन्तः वेदना 
मन के आँगन तक  को
गीला कर जाती हैं .
असहाय दग्ध भाव
छटपटाहट की 
चरम सीमा तक 
पहुँच कर
अंतर्नाद करते हुए 
मुझे..
तार - तार कर जाते हैं.

आह ! माँ के प्यार की 
वो भूख..
जो मेरी जिंदगी की 
तृष्णा बन गयी है.

उम्र का वह पड़ाव,
जब प्यार का भरपूर पानी 
जड़ों को मजबूत बना देता है...
मगर वो बचपन का प्यार 
जिन्दगी पा न सकी....
और ...
न मिली खुराक
मेरी रूह को..
और खुश्क रह गयी..
ये जिन्दगी.

आह ! ये विडम्बना....!
आह ! वो दीन-हीन बचपन ...!
और ये अविकसित वजूद...!!

मन के आँगन को 
इस भूख की तृष्णा 
आज भी 
गीला किये जाती है.